शुक्रवार, 19 मई 2017

.... गर रख लो जायदाद.

दो पल सुकून के नहीं ,गर रख लो जायदाद ,
पलकें झपक न पाओगे ,गर रख लो जायदाद ,
चुभती हैं अपने हाथों पर अपनी ही रोटियां
खाना भी खा न पाओगे ,गर रख लो जायदाद .
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क्या करती बड़े घर का तू ,इंसान बेऔलाद ,
रहने को घर न चाहिए ,गर रख लो जायदाद .
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मुझको भी रख ले साथ में,चाहत है सभी की,
अकेले रह न पायेगी ,गर रख लो जायदाद .
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ज़ालिम तू इस ज़माने से ,क्यों नहीं डर रही ,
डर-डर के जी सके है तू ,गर रख लो जायदाद .
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मकान हो,दुकान हो ,हैं और किसी की,
अकेले हो ज़माने में ,गर रख लो जायदाद.
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पहचान ले ज़माने की ,असलियत ''शालिनी '',
फुकती ही रहेगी सदा ,गर रख लो जायदाद .

...शालिनी कौशिक
[कौशल ]

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (21-05-2017) को
"मुद्दा तीन तलाक का, बना नाक का बाल" (चर्चा अंक-2634)
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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