राष्ट्रगान पर भारी सेल्फी

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   राष्ट्रगान एक ऐसा गान जो देशभक्ति की भावना हर एक भारतीय में भर देता है .जब भी कहीं राष्ट्रगान की धुन सुनाई देती है हर भारतीय का मस्तक गर्व से तन जाता है और वह अनायास ही सावधान की मुद्रा में खड़ा हो जाता है और तब तक खड़ा रहता है जब तक राष्ट्रगान बजता रहता है .30  नवम्बर 2016  को सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ''कि देशभर के सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य हो , ने सारे देश में राष्ट्रगान के इस तरह से सम्मान पर एक बहस सी छेड़ दी थी और लगभग आये जनमत के अनुसार इस तरह के सम्मान को देशभक्ति के दिखावे में सम्मिलित कर दिया था ,जबकि हमारे संविधान ने ही कई कर्तव्यों के साथ इसे भी एक कर्तव्य के रूप में ही सम्मिलित किया है पर किसी के प्रति भी जबरदस्ती की कोई भी भावना संविधान में ही व्यक्त नहीं की गयी है .भारत का संविधान अपने अनुच्छेद 51 -क में कहता है  -
51क. मूल कर्तव्य--भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह--
(क) संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे;
(ख) स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्र्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे;
(ग) भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे;
(घ) देश की रक्षा करे और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे;
(ङ) भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध है;
(च) हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करे;
(छ) प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करे और उसका संवर्धन करे तथा प्राणि मात्र के प्रति दयाभाव रखे;
(ज) वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे;
(झ) सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे;
(ञ) व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊँचाइयों को छू ले;
(]) यदि माता-पिता या संरक्षक है, छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले अपने, यथास्थिति, बालक या प्रतिपाल्य के लिए शिक्षा के अवसर प्रदान करे।]
    यही नहीं राष्ट्रगान को लेकर भारत में इसे बजने के नियम भी है जिनमे कहा गया है -
राष्ट्रगान बजाने के नियमों के अनुसार
1 -राष्‍ट्रगान का पूर्ण संस्‍करण निम्‍नलिखित अवसरों पर बजाया जाएगा:
*नागरिक और सैन्‍य अधिष्‍ठापन;
*जब राष्‍ट्र सलामी देता है (अर्थात इसका अर्थ है राष्‍ट्रपति या संबंधित राज्‍यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों के अंदर राज्‍यपाल/लेफ्टिनेंट गवर्नर को विशेष अवसरों पर राष्‍ट्र गान के साथ राष्‍ट्रीय सलामी - सलामी शस्‍त्र प्रस्‍तुत किया जाता है);
*परेड के दौरान - चाहे उपरोक्‍त में संदर्भित विशिष्‍ट अतिथि उपस्थित हों या नहीं;
*औपचारिक राज्‍य कार्यक्रमों और सरकार द्वारा आयोजित अन्‍य कार्यक्रमों में राष्‍ट्रपति के आगमन पर और सामूहिक कार्यक्रमों में तथा इन कार्यक्रमों से उनके वापस जाने के अवसर पर ;
*ऑल इंडिया रेडियो पर राष्‍ट्रपति के राष्‍ट्र को संबोधन से तत्‍काल पूर्व और उसके पश्‍चात;
*राज्‍यपाल/लेफ्टिनेंट गवर्नर के उनके राज्‍य/संघ राज्‍य के अंदर औपचारिक राज्‍य कार्यक्रमों में आगमन पर तथा इन कार्यक्रमों से उनके वापस जाने के समय;
*जब राष्‍ट्रीय ध्‍वज को परेड में लाया जाए;
*जब रेजीमेंट के रंग प्रस्‍तुत किए जाते हैं;
*नौसेना के रंगों को फहराने के लिए।
2 -जब राष्‍ट्र गान एक बैंड द्वारा बजाया जाता है तो राष्‍ट्र गान के पहले श्रोताओं की सहायता हेतु ड्रमों का एक क्रम बजाया जाएगा ताकि वे जान सकें कि अब राष्‍ट्र गान आरंभ होने वाला है। अन्‍यथा इसके कुछ विशेष संकेत होने चाहिए कि अब राष्‍ट्र गान को बजाना आरंभ होने वाला है। उदाहरण के लिए जब राष्‍ट्र गान बजाने से पहले एक विशेष प्रकार की धूमधाम की ध्‍वनि निकाली जाए या जब राष्‍ट्र गान के साथ सलामती की शुभकामनाएं भेजी जाएं या जब राष्‍ट्र गान गार्ड ऑफ ओनर द्वारा दी जाने वाली राष्‍ट्रीय सलामी का भाग हो। मार्चिंग ड्रिल के संदर्भ में रोल की अवधि धीमे मार्च में सात कदम होगी। यह रोल धीरे से आरंभ होगा, ध्‍वनि के तेज स्‍तर तक जितना अधिक संभव हो ऊंचा उठेगा और तब धीरे से मूल कोमलता तक कम हो जाएगा, किन्‍तु सातवीं बीट तक सुनाई देने योग्‍य बना रहेगा। तब राष्‍ट्र गान आरंभ करने से पहले एक बीट का विश्राम लिया जाएगा।
3 -राष्‍ट्र गान का संक्षिप्‍त संस्‍करण मेस में सलामती की शुभकामना देते समय बजाया जाएगा।
4 -राष्‍ट्र गान उन अन्‍य अवसरों पर बजाया जाएगा जिनके लिए भारत सरकार द्वारा विशेष आदेश जारी किए गए हैं।
5 -आम तौर पर राष्‍ट्र गान प्रधानमंत्री के लिए नहीं बजाया जाएगा जबकि ऐसा विशेष अवसर हो सकते हैं जब इसे बजाया जाए।
     और राष्ट्रगान की विकिपीडिया के अनुसार संख्या 4 के अनुसार भारत सरकार द्वारा विशेष आदेश जारी कर राष्ट्रगान को किसी अन्य अवसर पर भी बजवाया जा सकता  है यही नहीं राष्ट्रगान की विकिपीडिया कहती है कि जब राष्‍ट्र गान गाया या बजाया जाता है तो श्रोताओं को सावधान की मुद्रा में खड़े रहना चाहिए। यद्यपि जब किसी चल चित्र के भाग के रूप में राष्‍ट्र गान को किसी समाचार की गतिविधि या संक्षिप्‍त चलचित्र के दौरान बजाया जाए तो श्रोताओं से अपेक्षित नहीं है कि वे खड़े हो जाएं, क्‍योंकि उनके खड़े होने से फिल्‍म के प्रदर्शन में बाधा आएगी और एक असंतुलन और भ्रम पैदा होगा तथा राष्‍ट्र गान की गरिमा में वृद्धि नहीं होगी। जैसा कि राष्‍ट्र ध्‍वज को फहराने के मामले में होता है, यह लोगों की अच्‍छी भावना के लिए छोड दिया गया है कि वे राष्‍ट्र गान को गाते या बजाते समय किसी अनुचित गतिविधि में संलग्‍न नहीं हों।
    ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का 30  नवम्बर 2016 का आदेश कि राष्ट्रगान बजने पर हर दर्शक को खड़ा होना ही होगा सावधान की मुद्रा में देशभक्ति नहीं महज एक बंदिश ही लगता था और ऐसा नहीं है कि राष्ट्रगान  पहली बार विवाद का विषय बना हो .पहले यह गाने के लिए विवाद का विषय बना था ,विकिपीडिया के अनुसार विवाद यह था कि क्या किसी को कोई गीत गाने के लिये मजबूर किया जा सकता है अथवा नहीं? यह प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष बिजोए एम्मानुएल वर्सेस केरल राज्य AIR 1987 SC 748 [3] नाम के एक वाद में उठाया गया। इस वाद में कुछ विद्यार्थियों को स्कूल से इसलिये निकाल दिया गया था क्योंकि इन्होने राष्ट्र-गान जन-गण-मन को गाने से मना कर दिया था। यह विद्यार्थी स्कूल में राष्ट्र-गान के समय इसके सम्मान में खड़े होते थे तथा इसका सम्मान करते थे पर गाते नहीं थे। गाने के लिये उन्होंने मना कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने इनकी याचिका स्वीकार कर इन्हें स्कूल को वापस लेने को कहा। सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्र-गान का सम्मान तो करता है पर उसे गाता नहीं है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह इसका अपमान कर रहा है। अत: इसे न गाने के लिये उस व्यक्ति को दण्डित या प्रताड़ित नहीं किया जा सकता और पहले की ही तरह अब भी जबरदस्ती विवाद का विषय बनी,जब हमारे संविधान ने ही हम पर कोई जबरदस्ती नहीं की तो यह अधिकार हम किसी को भी नहीं देंगें और इसी देश स्तर की  बहस का परिणाम अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने पूर्व में किये गए फैसले को पलटना है .
     सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान निर्णय कहता है कि फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य नहीं है ,राष्ट्रगान बजाना निर्देशात्मक हो सकता है लेकिन ज़रूरी नहीं हो सकता है सही है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के ही अनुसार यह सिनेमाघर मालिकों की मर्जी पर निर्भर है कि वह राष्ट्रगान बजाना चाहते हैं या नहीं ,हाँ अगर सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाया जाता है तब दिव्यांगों को छोड़कर सभी दर्शकों को सम्मान में खड़ा होना होगा और ये हम सभी जानते हैं कि अगर ऐसा होता है तो यह महज दिखावा होगा क्योंकि हर फिल्म में वह प्रेरणा नहीं होती कि दर्शक वर्ग उसे देखने की चाह में राष्ट्रगान के लिए सम्मान से खड़ा हो जाये तब ये एकदम बोझ बन जायेगा क्योंकि अब न तो देश के सामने वह परिस्थिति है न वह फ़िल्में जिन्हे देखने के लिए दर्शक देशभक्ति की भाबना से ओत-प्रोत होता था .
          सभी जानते हैं कि यह देश के स्वतंत्रता प्राप्ति के एकदम बाद हुए समारोह में लता जी के द्वारा प्रदीप जी के गाये गाने का उस वक्त का ही असर था जो नेहरू जी की आँखों में आंसू भर आये थे ,आंसू तो आज भी भरते हैं किन्तु गरीबी ,भुखमरी के दृश्यों पर ,दर्शक आज भी सिनेमाघरों पर टूट पड़ते हैं किन्तु  अनोखी प्रेम कहानियों पर ,पहले उपकार का ज़माना था ,पूरब और पश्चिम का दर्शक दीवाना था ,शहीद होने को जनता तैयार थी और आज केवल लैला मजनू ,रोमिओ जूलियट के लिए आँखें बिछायी जाती हैं ,पहले ए मेरे वतन  के लोगों गाकर लोगों की आँखों में पानी भरा जाता था और आज चार बोतल वोदका काम मेरा रोज का गाकर जाम में खुद को डुबोया जाता है , सुप्रीम कोर्ट का यही निर्णय सिनेमाघरों में राष्ट्रगान की अनिवार्यता का यदि तब होता जब देश आजाद हुआ था तो एक भी ऊँगली न उठती ,किसी समर्थन की ज़रुरत नहीं पड़ती किन्तु अब स्थितियां अलग है ,अब देश के सामने अलग परेशानियां हैं और इसीलिए स्वतंत्रता सेनानियों को लोग भूल चुके हैं ,स्वतंत्रता के बाद देश के लिए अपना सब कुर्बान करने वालों को सब भूल चुके हैं  देश को किन मुसीबतों से किन्होंने उबारा आज किसी को याद नहीं ,याद है तो केवल अपना आज और अपने आज के लोगों द्वारा किये गाये दो-चार अच्छे काम .
    आज क्या है इसे हम अपने राजनीतिक हलकों की सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय पर की गयी टिप्पणियों से ही समझ सकते हैं .जिसमे कॉंग्रेस के राज बब्बर कहते हैं कि राष्ट्रगान के सम्मान को लेकर कोई टिप्पणी  नहीं ,हम सरकार  सुप्रीम कोर्ट के साथ हैं और एआई एम् आई एम् के असुदुद्दीन ओवेसी कहते हैं यह अच्छा फैसला है ,हम स्वागत करते हैं जनता राहत की साँस लेगी  ,भाजपा बेचैन होगी ,मतलब इस देश को अब राष्ट्रगान से कोई सरोकार नहीं सरोकार है तो केवल राजनीति से और यही राजनीति है जो सुप्रीम कोर्ट को ऐसे फैसले वापस लेने को बाध्य करती है ,बाध्य करती है उसे वह कार्य करने को जिससे इस देश की कथित देशभक्त जनता राहत की साँस ले सके जिसे अपने कुछ पल राष्ट्रगान को देने भारी पड़ते हैं ,जिसे देश भक्ति के नाम पर माथे पर तिरंगे के निशान बनाने के दिखावे कर सेल्फी खिंचवाने के कार्य ही सुहाने लगते हैं .ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय को वापस लेकर इस देश को दिखावे वादियों के भरोसे छोड़कर बिलकुल वही किया जो बरसों पहले हमारे शहीदों ने किया था -
   ''खुश रहो अहले वतन ,हम तो सफर करते हैं ,''

शालिनी कौशिक
 [कौशल ]




टिप्पणियाँ

Ravindra Singh Yadav ने कहा…
सारगर्भित, जानकारी से परिपूर्ण विचारणीय आलेख.

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