महिला आरक्षण की आड़ में अधिवक्ता एकता पर कुठाराघात -शालिनी कौशिक एडवोकेट
माननीय उच्चतम न्यायालय ने पूरे देश के ज़िला जजों को अपने अधिकार क्षेत्र के तहत आने वाले बार एसोसिएशनों की एग्जीक्यूटिव कमेटियों/गवर्निंग बॉडीज़ में महिला सदस्यों को नॉमिनेट करने का अधिकार दिया, ताकि उनमें 30 प्रतिशत महिलाओं के प्रतिनिधित्व का मानदंड पूरा हो सके।
स्पष्ट तौर पर यदि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय की तह में हम जाते हैँ तो यह निर्णय महिला अधिवक्ताओं के बार एसोसिएशन में प्रतिनिधित्व के मानदंड की पूर्ति करने से कहीं ज्यादा बेंच के अधिवक्ता संग़ठन में अनधिकृत हस्तक्षेप को साबित कर रहा है.
बार एसोसिएशन में आज तक जो भी अधिवक्ता पदाधिकारी या सदस्य होते आ रहे हैं वे चुनाव लड़कर ही आते हैँ, किसी तरह का कोई आरक्षण यहाँ लागू नहीं किया जाता है. महिला अधिवक्ताओं को कार्यकारिणी में आने से रोकने का तो कोई एजेंडा किसी एसोसिएशन में लाया ही नहीं जाता, जो भी महिला अधिवक्ता चुनाव लड़कर पदाधिकारी या सदस्य बनना चाहती है वह चुनाव लड़कर एसोसिएशन में पद धारण कर सकती है स्वयं मैंने ही 2018 में निर्विरोध रहकर और 2020 में 18 वोट से जीतकर बार एसोसिएशन कैराना में कनिष्ठ उपाध्यक्ष के पद पर कार्य किया था. चुनाव लड़कर जीते हुए एडवोकेट वकीलों के ही प्रतिनिधि होते हैँ तो उनके ही हितों की बात करते हैँ अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जिला जज द्वारा नॉमिनेट प्रतिनिधि वकीलों के प्रतिनिधि न रहकर बेंच के शैडो प्रतिनिधि बनकर ; बेंच-बार विवाद की स्थिति में, उनके हितों के ज्यादा बड़े प्रतिनिधि होंगे, जो कि सीधे सीधे वकीलों की एकता में सेंध लगाकर उनके न्यायहितों पर कुठाराघात है।
बार कॉउसिल ऑफ इंडिया को इसका प्रबल विरोध करते हुए अधिवक्ता समुदाय को '' फ़ूट डालो राज करो '' के कुचक्र से बचाना चाहिए.
अधिवक्ता एकता जिन्दाबाद
द्वारा
शालिनी कौशिक
एडवोकेट
कैराना (शामली )

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