औरत को जूती पैर की ही माने आदमी


औरत पे ज़ुल्म हो रहे कर रहा आदमी
सच्चाई को कुबूलना ये चाहते नहीं ,
गैरों के कंधे थामकर बन्दूक चलना
ये कर रहे हैं काम मगर मानते नहीं !
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औरत को जूती पैर की ही माने आदमी
सम्मान देने रोग मान पालते नहीं ,
ये चाहें इसपे बस हुक्म चलाना
 करना भला इसका कभी विचारते नहीं !
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औरत लुटा दे मर्द पर भले ही ज़िंदगी
वे रहते हैं कभी किसी मुगालते नहीं ,
खिदमत हमारी करना औरत की है किस्मत
करना है कुछ उसके लिए ये जानते नहीं !
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जनम-जनम का साथ है पत्नी पति का मांगती
ये पत्नी को दिल में कभी उतारते नहीं ,
चाह रखके बेटों की ये बेटियां हैं मारती
ये बुराई तक माँ के लिए हैं मारते नहीं !
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''शालिनी ''की तड़प का है ना सबूत कोई
अपने किये को ये कभी धिक्कारते नहीं ,
बेटी हो या बहन हो ,ये पत्नी हो या माँ हो
अपने को किसी हाल ये सुधारते नहीं !
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शालिनी कौशिक
       [कौशल ]

टिप्पणियाँ

Dilbag Virk ने कहा…
आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 03-07-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1663 में दिया गया है
आभार
Prasanna Badan Chaturvedi ने कहा…
बेहद उम्दा रचना और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
नयी पोस्ट@दर्द दिलों के
नयी पोस्ट@बड़ी दूर से आये हैं
रश्मि शर्मा ने कहा…
बहुत सही लि‍खा आपने..
dr.mahendrag ने कहा…
सुन्दर कृति , पर अब यह सिलसिला ज्यादा दिन चलने वाला नहीं , अब आदमी को सुधरना ही होगा
Suman ने कहा…
बहुत कुछ बदल रहा कुछ बदलना बाकी है
सार्थक रचना !

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