शनिवार, 25 अक्तूबर 2014

जन सहयोग जरूरी पर स्वच्छ मन से

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   2 अक्टूबर का दिन और इंडिया गेट हमेशा से महत्वपूर्ण रहे हैं किन्तु अचानक अति महत्वपूर्ण श्रेणी में आ गए तब जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने इस दिन इस स्थान पर अपनी महत्वाकांक्षी योजना ''स्वच्छ भारत अभियान ''की शुरुआत की और देशवासियों को माँ भारती को स्वच्छ रखने के लिए काम से काम १०० घंटे का श्रमदान करने की शपथ दिलाई .दिल्ली के ऐतिहासिक राजपथ पर उन्होंने शपथ दिलवाई ''न गंदगी करूँगा न करने दूंगा।''
   गंदगी जो आज भारत में विस्तृत अर्थों में व् विस्तृत क्षेत्रों में फैली हुई है .७९ लाख टन कचरा भारत में प्रतिवर्ष निकलता है और ८०%गंदगी शहरों से प्रतिवर्ष पवित्र गंगा में आती है .
     पी आई वी के स्रोत से प्राप्त जानकारी के अनुसार हमारे देश के ग्रामीण इलाकों में स्वच्छता की भारी कमी है ,अगर ग्रामीण इलाकों में स्वच्छ भारत अभियान को ठीक से चलाया जायेगा तो निश्चित रूप से लोगों के जीवन स्तर में तो सुधार होगा ही ,स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च भी घटेगा .
      २०११ की जनगणना की शौचालय सुविधा पर आधारित आंकड़े बताते हैं कि सबसे कम ग्रामीण स्वच्छता वाले राज्य हैं -
      राज्य                             स्वच्छता प्रतिशत
     झारखण्ड                             ०८.३३%
    मध्य प्रदेश                            १३.५८%
   छत्तीसगढ़                            १४.८५%
    ओडिशा                                १५.३२%
   बिहार                                    १८.६१%
       ३ अक्टूबर २०१४ को अमर उजाला अपने सम्पादकीय में लिखता है -
   ''महात्मा गांधी ने १९२५ में जब यह कहा था कि देश की स्वतंत्रता से कहीं अधिक ज़रूरी स्वच्छता है तो उस समय की परिस्थितियां आज से एकदम भिन्न थी .उस वक्त देश में आयु प्रत्याशा ३५ वर्ष से भी कम थी और हैजा ,अतिसार ,मलेरिया और टाइफाइड जैसी बीमारियां बच्चों की मौत का बड़ा कारण थी .गांधी ने ९० वर्ष पूर्व जिस मुद्दे की ओर ध्यान खींचा था ,उसकी ओर दुनिया का ध्यान ९० के दशक में तब गया जब संयुक्त राष्ट्र ने इसे अभियान की तरह लिया .वास्तव में इन बीमारियों का सम्बन्ध प्रदूषित पानी व् गंदगी से है .हालाँकि भारत के सम्बन्ध में स्वच्छता का मुद्दा छुआछूत और जाति तथा वर्ग व्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है जिसके बारे में गांधी का मानना था कि सफाई का काम करने वाले और मैला ढोने वाले वर्ग के उत्थान के बिना असमता को दूर नहीं किया जा सकता ...........''
        प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने गांधी जी की इसी विचारधारा को मद्देनज़र रखते हुए उनकी १४५ वीं जयंती पर स्वच्छ भारत के इस अभियान की शुरुआत की और अपनी इसी मंशा को सफल बनाने हेतु उन्होंने सोशल मीडिया को स्वच्छता का हथियार बनाया है .mygov.in में स्वच्छता अभियान को शामिल करने के साथ प्रधानमंत्री ने कहा कि क्लीन इंडिया के लिए एक अलग वेबसाइट बनायीं है . 
    ''आप कहीं कूड़ा कचरा है तो उसकी फोटो आप अपलोड कीजिये फिर उसकी सफाई आप कीजिये ,उसका वीडियो अपलोड कीजिये और फिर स्वच्छ हुए स्थान का फोटो अपलोड कीजिये .''
   
  और प्रधानमंत्री की इस पहल का असर सारे देश में देखने में आया .लखनऊ में गृहमंत्री राजनाथ सिंह पत्नी सावित्री सिंह के साथ सफाई करते देखे गए ,देवरिया रेलवे स्टेशन पर केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्रा ने सफाई की ,बंगलुरु में दीवारों और फुटपाथों को साफ़ करते सॉफ्टवेयर इंजीनियर दिखे .मुंबई में बृहस्पतिवार को दादर बीच पर साफ सफाई करते कॉलेज के छात्र-छात्राएं दिखे ,स्वयं प्रधानमंत्री ने नई दिल्ली स्थित वाल्मीकि बस्ती में सफाई की .
   किन्तु सवाल ये उठता है कि हमारा देश बहुत विशाल है और उतना ही विशाल है यहाँ गंदगी का साम्राज्य और पहल अच्छी है किन्तु निरंतरता इसमें कायम रहेगी इसमें संदेह है क्योंकि ऐसे कार्यक्रम एक दिन में सफलता प्राप्त नहीं कर सकते इसके लिए निरंतरता ज़रूरी है .अमर उजाला समाचार में एक पाठक मोहित शर्मा खतौली से लिखते हैं -''सफाई सिर्फ दिखावा -प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो अक्टूबर से देश में सफाई अभियान चलाया है लेकिन क्षेत्रीय नेता कैमरे के सामने झाड़ू उठाकर सफाई करने का सिर्फ दिखावा कर रहे हैं फोटो खिंचते ही ये नेता झाड़ू रखकर चले जाते हैं .''
   वाकई यह शर्मनाक है कि देश के ग्रामीण क्षेत्रों में करीब ६० फीसदी घरों में आज भी शौचालय नहीं हैं .संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट बताती है कि खुएल में शौच करने वालों की संख्या भारत में सर्वाधिक है .अब यह बात सामने आ चुकी है कि भारत में कुपोषण और अनेक बीमारियों की जड़ गंदगी और खुले में शौच करने की मजबूरी में छिपी है .जाहिर है मात्र झाड़ू लगाना इस चुनौती से निपटने में नाकाफी प्रयास है .
      और इस प्रयास को सक्षम बनाने हेतु उस तबके के सहयोग की परम आवश्यकता है जिसके जिम्मे साफ़ सफाई की वर्तमान में जिम्मेदारी है और जो आज भी तिरस्कार व् उपेक्षा के सर्वाधिक भोगी हैं .आम आदमी पार्टी के मुख्य प्रवक्ता योगेन्द्र यादव कहते हैं -''सफाई कर्मचारियों के कामकाज की स्थितियों पर ध्यान देना राष्ट्र की प्राथमिकता में शामिल किया जाना चाहिए ......सीवरों की सफाई करने वाले लोगों की दयनीय स्थिति राष्ट्रीय शर्म की बात है .....काम के लिए जिस किस्म के सुरक्षा उपकरण अग्निशामक दस्ते में शामिल लोगों को दिए जाते हैं वैसे ही उपकरण सीवरों की सफाई करने वाले लोगों को दिए जाने चाहियें .''
          योगेन्द्र यादव ,अमर उजाला का सम्पादकीय और स्वयं मैं भी यही मानती हूँ कि इस अभियान की सार्थकता तभी है जब हम अपने मन की सफाई कर सकें .छुआछूत को अपने दिमाग से परे हटाकर हमें महात्मा गांधी की भांति अपने को स्वच्छता की कसौटी पर कसना होगा .यह अभियान तो मात्र एक पहल है इसे आंदोलन हमें बनाना होगा और सफाई कर्मचारी समुदाय के साथ जुड़कर अपना निष्पक्ष योगदान देना होगा .स्वयं वीरभूम जिले में मिशन की शुरुआत करते हुए राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने भी यही सन्देश दिया है -
    ''कि सरकार अकेले अशिक्षा ,अस्वच्छता ,पर्यावरण जैसी समस्याओं को नहीं सुलझा सकती इसके लिए आम लोगों को साथ जुड़ना ही होगा .''
  क्योंकि इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता कि -
    ''पूरी धरा भी साथ दे तो और बात है ,
    पर तू ज़रा भी साथ दे तो और बात है ,
    चलने को तो एक पाँव से भी चल रहे हैं लोग 
     ये दूसरा भी साथ दे तो और बात है .''

शालिनी कौशिक 
   [कौशल ]

1 टिप्पणी:

Anita ने कहा…

इस अभियान की सार्थकता तभी है जब हम अपने मन की सफाई कर सकें .छुआछूत को अपने दिमाग से परे हटाकर हमें महात्मा गांधी की भांति अपने को स्वच्छता की कसौटी पर कसना होगा .यह अभियान तो मात्र एक पहल है इसे आंदोलन हमें बनाना होगा और सफाई कर्मचारी समुदाय के साथ जुड़कर अपना निष्पक्ष योगदान देना होगा .
सार्थक पोस्ट..

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