याकूब या कोली :फांसी नहीं न्याय की हमजोली


वरुण गांधी भी कूदे बहस मेंफैसले की आलोचना करते हुए दिया इस्तीफा
1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट के दोषी याकूब मेमन को फांसी दिए जाने के बाद भारत में फांसी की सजा खत्म करने की आवाज तेज हो रही है। तमाम सामाजिक संगठनों के बाद अब भाजपा सांसद वरुण गांधी भी इस बहस में कूद पड़े हैं और इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट के डिप्टी रजिस्ट्रार ने भी इस्तीफा दिया है सर्वोच्च न्यायालय के डिप्टी रजिस्ट्रार और डेथ पेनाल्टी रिसर्च प्रोजेक्ट के डायरेक्टर प्रो.अनूप सुरेन्द्र नाथ ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले की आलोचना करते हुए इस्तीफा दे दिया है, जिसमें न्यायालय ने 1993 मुंबई ब्लास्ट के दोषी याकूब मेमन की आखिरी दया याचिका खारिज कर दी थी।
वरुण गांधी ने फांसी की सजा का पुरजोर विरोध किया है। एक लेख में वरुण ने मौत की सजा पर कई सवाल उठाए हैं। उनके लेख में किसी एक शख्स की फांसी का जिक्र नहीं है, लेकिन उन्होंने फांसी की सजा को क्रूर बताया है।
वरुण ने कहा है कि मौत की सजा पाने वालों में से 75 फीसदी सामाजिक और आर्थिक स्तर पर दरकिनार श्रेणी के लोग हैं। ऐसे मामलों में 94 फीसदी लोग दलित समुदाय या अल्पसंख्यक हैं। मौत की सजा गरीबी की वजह से कमजोर कानूनी लड़ाई का नतीजा है।
हालाँकि वरुण की बात में आधी ही सच्चाई है किन्तु आधी तो है और निठारी कांड में कोली को मिली हुई फांसी की सजा इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है .
अब अगर हम याकूब मेनन को हुई फांसी पर विरोध को मद्देनज़र रखें तो ये विरोध उनके कृत्य को देखते हुए हम सही नहीं कहेंगें किन्तु याकूब इस सजा के नहीं वरन तिल-तिल कर अपने अपराध की सजा भुगतने के पात्र थे क्योंकि इस तरह वे एक बार में ही अपने अपराध के दंड से मुक्त हो गए उन्होंने जो किया था उसका वास्तविक दंड वह होता जो वे अपने अपनों से दूर रखकर भुगतते क्योंकि तभी उन्हें उस पीड़ा का एहसास होता जो उन्होंने औरों को दी .
फाँसी से हम एक अपराधी का अंत कर सकते हैं सम्पूर्ण अपराध का नहीं .हमें स्वयं में हिम्मत लानी होगी कि ऐसी घटनाओं को नज़रअंदाज न करते हुए न केवल अपने बचाव के लिए बल्कि दूसरे किसी के भी बचाव के लिए कंधे से कन्धा मिलकर खड़े हों .ये सोचना हमारा काम नहीं है कि जिसके साथ घटना हो रही है शायद उसका भी कोई दोष हो .हमें केवल यह देखना है कि जो घट रहा है यदि वह अपराध है तो हमें उसे रोकना है और यदि इस सबके बावजूद भी कोई घटना दुर्भाग्य से घट जाती है तो पीड़ित को समाज से बहिष्कृत न करते हुए उसके समाज में पुनर्वास में योगदान देना है और अपराधी को एकजुट हो कानून के समक्ष प्रस्तुत करना है ताकि वह अपने किये हुए अपराध का दंड भुगत सके .सिर्फ कोरी बयान बाजी और आन्दोलन इस समस्या का समाधान नहीं हैं बल्कि हमारी अपराध के सच्चे विरोध में ही इस समस्या का हल छुपा है .चश्मदीद गवाह जिनके कारण इलाहबाद हाईकोर्ट को मुज़फ्फरनगर की जिला अदालत में सरेंडर करने पहुंचे मुल्ज़िम को कोर्ट रूम से घसीटने के आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी करना पड़ा है ,ये ही चश्मदीद गवाह जो कि सब जगह होते हैं किन्तु लगभग हर जगह अपने कर्तव्य से पीछे हट जाते हैं किसी भी मामले को सही निर्णय  तक पहुंचा सकते हैं और ऐसी घटनाओं में हमें अपनी ऐसी भूमिका के निर्वहन को आगे बढ़ना होगा क्योंकि ये एक सत्य ही है कि ज़रूरी नहीं कि हमेशा कोई दूसरा ही ऐसी घटना का शिकार हो कल इसके शिकार हम या हमारा भी कोई हो सकता है इसलिए सच्चे मन से न्याय की राह पर आगे बढ़ना होगा .इसलिए अगर हममें कुछ कहने का साहस है कुछ करने की हिम्मत है तो न्याय का साथ देना होगा और अपराध को अपनी हिम्मत से कमज़ोर करना होगा न कि फांसी को अपने कानून द्वारा दिए जाने वाले दंड में शामिल कर अपराधियों को डराने के एक कमजोर अस्त्र के प्रयोग द्वारा अपराध को ख़त्म करने की कोशिश द्वारा .
याद रखिये फाँसी निबटा देती है अपराधी को अपराध को नहीं .वह अपराधी को पश्चाताप का अवसर नहीं देती हालाँकि हर अपराधी पश्चाताप की ओर अग्रसर भी नहीं होता किन्तु एक सम्भावना तो रहती ही है और दूसरी बात जो वीभत्स तरीका वे अपराध के लिए अपनाते हैं फाँसी उसका एक अंश भी दंड उन्हें नहीं देती .आजीवन कारावास उन्हें पश्चाताप की ओर भी अग्रसर कर सकता है और यही वह दंड है जो तिल तिल कर अपने अपराध का दंड भी उन्हें भुगतने को विवश करता है .

[published in janvani [cyber world ]on 3 aug 2015 ]

शालिनी कौशिक
[कौशल ]

टिप्पणियाँ

Anita ने कहा…
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