न्याय पथभ्रष्ट हो रहा है...

"इंसाफ जालिमों की हिमायत में जायेगा, ये हाल है तो कौन अदालत में जायेगा."
   राहत इन्दोरी के ये शब्द और २६ नवम्बर को सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ के द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट  पर किया   गया दोषारोपण "कि हाईकोर्ट में सफाई के सख्त कदम उठाने की ज़रुरत है क्योंकि यहाँ कुछ सड़ रहा है."साबित करते हैं कि न्याय भटकने की राह पर चल पड़ा है.इस बात को अब सुप्रीम कोर्ट भी मान रही है कि न्याय के भटकाव ने आम आदमी के विश्वास को हिलाया है वह विश्वास जो सदियों से कायम था कि जीत सच्चाई की होती है पर आज ऐसा नहीं है ,आज जीत दबंगई की है ,दलाली की है .अपराधी     बाईज्ज़त     बरी हो रहे हैं और न्याय का यह सिद्धांत "कि भले ही सौ अपराधी छूट   जाएँ किन्तु एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए"मिटटी में लोट रहा है .स्थिति आज ये हो गयी है कि आज कातिल खुले आकाश के नीचे घूम रहे हैं और क़त्ल हुए आदमी की आत्मा  तक को कष्ट दे रहे हैं-खालिद जाहिद के शब्दों में-
"वो हादसा तो हुआ ही नहीं कहीं,
अख़बार की जो शहर में कीमत बढ़ा गया,
सच ये है मेरे क़त्ल में वो भी शरीक था,
जो शख्स मेरी कब्र पे चादर चढ़ा गया."
न्याय का पथभ्रष्ट होना आम आदमी के लिए बहुत ही कष्टदायक हो रहा है.आम आदमी खून के आंसू रो रहा है.निचले स्तर पर भ्रष्टाचार   को झेल जब वह उच्च अदालत में भी भ्रष्टाचार को हावी हुआ पाता है तो वह अपने होश खो बैठता है .अपराध कुछ और वह पलट कर कुछ और कर दिया जाता है और अपराधी को बरी होने का मौका कानूनन   मिल जाता है.हफ़ीज़ मेरठी के शब्दों में-
"अजीब लोग हैं क्या मुन्सफी की है,
हमारे क़त्ल को कहते हैं ख़ुदकुशी की है."
आश्चर्य की बात तो यह है कि संविधान द्वारा दिए गए कर्त्तव्य को उच्चतम न्यायालय जितनी मुस्तैदी से निभा रहा है उच्च न्यायालयों में वह श्रद्धा प्रतीत नहीं होतीजबकि संविधान द्वारा लोकतंत्र के आधार स्तम्भ में लोकतंत्र की मर्यादा बनाये रखने के जिम्मेदारी न्यायालयों को सौंपी गयी है और इस तरह उच्च न्यायालयों का भी ये उत्तरदायित्व बनता है कि वे भी उच्चतम न्यायालय की तरह न्याय के संरक्षक बने .उच्च न्यायालय अपनी गरिमा के अनुसार कार्य नहीं कर रहे हैं .कभी कर्णाटक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश दिनाकरण का मामला न्याय को ठेस लगाता है तो कभी सुप्रीम कोर्ट की इलाहाबाद हाईकोर्ट में "सडन"की टिपण्णी से सर शर्म से झुक जाता है प्रतीत होता है कि मुज़फ्फर रज्मी के शब्दों में न्याय भी ये कह रहा है-
"टुकड़े-टुकड़े हो गया आइना गिर कर हाथ से,
मेरा चेहरा अनगिनत टुकड़ों में बँटकर रह गया."
न्याय पथभ्रष्ट हो रहा है...

टिप्पणियाँ

जिन मामलों का शालिनी आपने उदहारण दिया है वे हमारी पूरी न्यायिक व्यवस्था पर ही प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं...... सार्थक सवाल उठाती पोस्ट
kshama ने कहा…
"टुकड़े-टुकड़े हो गया आइना गिर कर हाथ से,
मेरा चेहरा अनगिनत टुकड़ों में बँटकर रह गया."
न्याय पथभ्रष्ट हो रहा है...
Hamari nyay wyawastha 200 saal purani....angrezon kee banee huee!Jab tak log gadar nahi machayenge,ye sadi gali yantrana nahi badalnewali!
शिखा कौशिक ने कहा…
बहुत सार्थक प्रस्तुति .विचारणीय आलेख.आभार.....
ali ने कहा…
अब ये राज कहां रहा ? चिंतनपरक आलेख ! शानदार आलेख !
VIJUY RONJAN ने कहा…
Shaslini ji aapke vichar man ke andar bawandar uthane ke liye kafi hai...

yahan to aadha nyaya bhi nahi milta , putrri ki to bat hi chhoriye.
Tulsidas ji ne kaha tha "SHATH SUDHARAHIN SAT SANGAT PAYEE."
maine unse differ karte huye ek dafa likha tha "SANT KUSANGAT SHATH BAN JAYEE."
Mere vichar se ham khud ko dekhen aur apne antarman ki sune.Doosron ko sudharna atyant kathin..
Fir bhi prayas jaari rahna chahiye..
Apne ojaswi vichar prastut karti rahein , yahi aagrah hai.
G.N.SHAW ने कहा…
bilkul chinta ki baat hai..good post...

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