गुरुवार, 27 जून 2013

फहमाइश देती ''शालिनी ''इन हुक्मरानों को ,



बेचकर ईमान को ये देश खा गए .
बरगला अवाम को ये दिन दिखा गए .
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साहिबे आलम बने घूमे हैं वतन में ,
फ़र्ज़ कैसे भूलना हमको सिखा गए .
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वीरान सबका आज कर अपना संवारे कल ,
फरेबी मेहरबान लूटकर खा गए .
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ज़म्हूरियत के निगहबान जमघट के तलबगार ,
वादों के लचर झूले में सबको झुला गए .
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फ़ालिज जुदा हो लोकतंत्र देखे टुकुर-टुकुर ,
बेबसी के आंसू उसको रुला गए .
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फिजायें तक जिस मुल्क की मुरौवत भरी ,
हवाएं भी वहां की बेरहम बना गए .
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बेताबी में हथियाने को सत्ता की ये कुर्सी ,
फ़स्ले-बहार में हमें खिज़ा थमा गए .
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फहमाइश देती ''शालिनी ''इन हुक्मरानों को ,
झुलसाएगी वो आग जिसे कल लगा गए .
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शब्दार्थ- फहमाइश -चेतावनी ,फालिज जुदा -लकवे से मारा हुआ ,मुरौवत -मानवता ,फ़स्ले-बहार -वसंत ऋतू ,हुक्मरानों -हुक्म चलने वालों ,खिज़ा-पतझड़,

    शालिनी कौशिक 

          [कौशल ]

15 टिप्‍पणियां:

shikha kaushik ने कहा…

bahut sundar v sateek prastuti .aabhar

shikha kaushik ने कहा…

bahut sundar v sateek prastuti .aabhar

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज शुक्रवार (28-06-2013) को भूले ना एहसान, शहीदों नमन नमस्ते - चर्चा मंच 1290 में "मयंक का कोना" पर भी है!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

एक एक पंक्ति सही है !!

Madan Mohan Saxena ने कहा…

Sundar gazal Shaliniji.

kshama ने कहा…

फिजायें तक जिस मुल्क की मुरौवत भरी ,
हवाएं भी वहां की बेरहम बना गए .
..................................................
बेताबी में हथियाने को सत्ता की ये कुर्सी ,
फ़स्ले-बहार में हमें खिज़ा थमा गए .
.......................................................
फहमाइश देती ''शालिनी ''इन हुक्मरानों को ,
झुलसाएगी वो आग जिसे कल लगा गए .
Kya gazabkee panktiyan hain.....inka warnana kaise karun?

Ranjana Verma ने कहा…

बहुत सुंदर ग़ज़ सुंदर अभिव्यक्ति .....!!

Ranjana Verma ने कहा…

बहुत सुंदर ग़ज़ सुंदर अभिव्यक्ति .....!!

Ranjana Verma ने कहा…

बहुत सुंदर ग़ज़ सुंदर अभिव्यक्ति .....!!

Bhola-Krishna ने कहा…


अक्षरशः सत्य कथन !
पार्टी कोई भी हो, अधिकाँश हुक्मरान ,नेताओं की जी हुजूरी में लगे ,आवाम को लूट कर स्वयम अपनी और नेताओं की जेब गर्म करते हैं ! शालोनी बेटा ,

हैवान भी बेहतर हैं तिर्छी-टोपि-धारी से
जो कफन के लट्ठे का कुर्ता सिला गये !

Ramakant Singh ने कहा…

बेताबी में हथियाने को सत्ता की ये कुर्सी ,
फ़स्ले-बहार में हमें खिज़ा थमा गए .
BEAUTIFUL LINES AND GREAT THOUGHT

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर और सटीक प्रस्तुति...

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

क्या कहने हैं अभिव्यक्ति के बिम्ब के .अर्थ और भाव के सब कुछ के सार के .

बहुत सशक्त अर्थ सार लिए देश के हालात लिए प्रस्तुति है आपकी .शब्द सौन्दर्य और प्रतीक लाज़वाब .

Sanjay Tripathi ने कहा…

चारु-चारु!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत खूब रचना।

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