आज की फ़िल्में और गाने मात्र बकवास


   संगीत हमेशा से फिल्मों की जान रहा है .कितनी ही फ़िल्में संगीत के दम पर प्रसिद्धि का शिखर छूती रही है .मुगले आज़म हो या बैजू बावरा ,आवारा हो या श्री चार सौ बीस ,संगम आदि बहुत सी पुरानी फ़िल्में हो या कुछ अभी लगभग एक या दो दशक पुरानी हम आपके हैं कौन ,विवाह मैंने प्यार किया आदि फ़िल्में संगीत के मामले में बहुत ही उत्कृष्ट कोटि की फ़िल्में रही और इन फिल्मों के संगीत को वास्तव में संगीत कहा भी जा सकता है लेकिन आज की फ़िल्में और उनका संगीत ना तो फिल्म में वह बात है और न ही उनके गानों में और रेडियो चैनल जोर शोर से उनके संगीत को कभी मधुर कभी शानदार कह प्रचारित कर रहे हैं और बजा रहे है .सुन सुनकर वास्तव में कानों में दर्द होने लगता है अभी कल रात की ही बात है कि रेडियो सिटी पर आदि के प्रोग्राम में ''शनिवार राति'' गाना आ रहा था न तो गाना था और न शब्द बस जोर शोर से बजाया जा रहा था .ऐसे गाने सुनकर मन करता है कि या तो अपना ट्रांजिस्टर फोड़ दिया जाये या अपने देश के संगीत के गिरते स्तर पर सिर पीट लिया जाये .आखिर कब हमारे फिल्मकार इस ओर ध्यान देंगें कि वे फिल्मों के और उनके संगीत के नाम पर मात्र फूहड़ता ही परोस रहे हैं अब .आखिर वे क्यों अपने पूर्व के फिल्मकारों से कुछ सीखना नहीं चाहते ?क्यों नहीं देखते कि आज देश समाज में वे जिन फिल्मों और गानों को प्रसारित कर रहे है वे युवाओं में उत्तेजना पैदा कर रही हैं प्रेरणा नहीं . वे युवतियों को महज उत्पाद बना रहे हैं और युवकों को मात्र उनका उपभोक्ता व् आशिक ,क्या यही है हमारी फिल्मों का उद्देश्य ?क्या हमारे पुराने फिल्मकारों ने उन्हें यही कुछ करने की ज़मीन दी है ,अगर आज के फ़िल्मकार अपने दायित्व को सही तरह से नहीं निभा सकते तो उन्हें फ़िल्में बनाना छोड़कर सड़कों पे तमाशा करना ही शुरू कर देना चाहिए क्योंकि इस कार्य से वे इस सबसे ज्यादा पैसा तो कमा ही लेंगें जो वे ऐसी फिल्मों से कमा रहे हैं .
शालिनी कौशिक 
   [कौशल ]

टिप्पणियाँ

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (04-01-2015) को "एक और वर्ष बीत गया..." (चर्चा-1848) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
नव वर्ष-2015 की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (04-01-2015) को "एक और वर्ष बीत गया..." (चर्चा-1848) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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नव वर्ष-2015 की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
dr.mahendrag ने कहा…
लचर कहानी,बेमतलब के संवाद, हल्ला गुल्ला भरा संगीत,यह आज की फिल्मों की विशेषता है , जितने दिन फिल्म बनाने में लगते हैं उसके दसवें भाग में भी फिल्म नहीं चलती। गाने तो अब न लिखने वाले रहे न कर्णप्रिय संगीत देने वाले संगीतकार रहे कानफोड़ू संगीत, हिंदी अंग्रेजी मिले बेतुके गाने इतने कटु लगते हैं कि टी वी बंद कर ही सुकून मिलता है
dr.mahendrag ने कहा…
लचर कहानी,बेमतलब के संवाद, हल्ला गुल्ला भरा संगीत,यह आज की फिल्मों की विशेषता है , जितने दिन फिल्म बनाने में लगते हैं उसके दसवें भाग में भी फिल्म नहीं चलती। गाने तो अब न लिखने वाले रहे न कर्णप्रिय संगीत देने वाले संगीतकार रहे कानफोड़ू संगीत, हिंदी अंग्रेजी मिले बेतुके गाने इतने कटु लगते हैं कि टी वी बंद कर ही सुकून मिलता है

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