क़त्ल करने मुझे देखो , कब्र में घुस के बैठे हैं .


नहीं वे जानते मुझको,  दुश्मनी करके बैठे हैं ,
मेरे कुछ मिलने वाले भी,  उन्हीं से मिलके बैठे हैं ,
समझकर वे मुझे कायर,  बहुत खुश हो रहे नादाँ
क़त्ल करने मुझे देखो , कब्र में घुस के बैठे हैं .
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गिला वे कर रहे आकर , हमारे गुमसुम रहने का ,
गुलूबंद को जो कानों से , लपेटे अपने बैठे हैं .
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हमें गुस्ताख़ कहते हैं , गुनाह ऊँगली पे गिनवाएं ,
सवेरे से जो रातों तक , गालियाँ दे के बैठे हैं .
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नतीजा उनसे मिलने का , आज है सामने आया ,
पड़े हम जेल में आकर , वे घर हुक्का ले बैठे हैं .
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रखे जो रंजिशें दिल में , कभी न वो बदलता है ,
भले ही अपने होठों पर , तबस्सुम ले के बैठे है .
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नज़ीर ''शालिनी '' की ये , नज़रअंदाज़ मत करना ,
कहीं न कहना पड़ जाये , मियां तो लुट के बैठे हैं .
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शालिनी कौशिक
[कौशल ]

टिप्पणियाँ

Sanghsheel 'Sagar' ने कहा…
खूबसूरत ग़ज़ल !
सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (13-01-2015) को अधजल गगरी छलकत जाये प्राणप्रिये..; चर्चा मंच 1857 पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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उल्लास और उमंग के पर्व
लोहड़ी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
Digamber Naswa ने कहा…
अर्थपूर्ण सभी मुक्तक और शेर ...
dr.mahendrag ने कहा…
हमें गुस्ताख़ कहते हैं , गुनाह ऊँगली पे गिनवाएं ,
अच्छे शेर ,अच्छी गजल
Yashwant Yash ने कहा…
आज 22/जनवरी/2015 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!
Kavita Rawat ने कहा…
बहुत सुन्दर ..

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