रविवार, 7 नवंबर 2010

jindgi ki lalak

" देख कर तुझे पाने की ललक में,
        कर न जाएँ हम कुछ गलत कहीं ,
            तुम चीज़ ही ऐसी हो,
                 जिससे बढ़कर दुनिया में कुछ और नहीं.
कोई चाहे तुम्हे या न चाहे,
      तुम उसे मिल ही जाती हो,
           सब पूछते हैं मुझसे,
                  क्या तुम मेरी जिंदगी तो नहीं?

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... पता ही नहीं चला.

बारिश की बूंदे  गिरती लगातार  रोक देती हैं  गति जिंदगी की  और बहा ले जाती हैं  अपने साथ  कभी दर्द  तो  कभी खुशी भी  ...