मंगलवार, 2 नवंबर 2010

sampatti ek sirdard

आज ही क्या बहुत पहले से या यूं कहे सृष्टि के आरम्भ से आदमी को संपत्ति की चाह है.संपत्ति की चाह के कारण ही दुनिया ने बहुत कुछ देखा है.भारत जैसे राष्ट्र को कभी विदेशी हमलो तो कभी आतंरिक झगड़ो को भी संपत्ति के कारण ही झेलना पड़ा है.ये तो आप सभी जानते हैं कि भारत को सोने कि चिड़िया कहा जाता है और यही उपाधि इसकी लगभग दो सो वर्षो कि गुलामी का कारण बनी.
संपत्ति को मैंने ऐसे ही सिरदर्द नहीं कहा है,मैं ही क्या ये तो आप सभी को पता है कि पैसा न हो तो परेशानी और पैसा हो तो और भी बड़ी परेशानी.एक तरफ पैसे क़ी कमी लोगो को आत्महत्या तक के लिए विवश कर देती है तो एक तरफ पैसे क़ी अधिकता meerut जैसे शहर में प्रोपर्टी deelar के पूरे परिवार क़ी हत्या करा देती है. संपत्ति न हो तो चिंता आदमी को सोने नहीं देती और संपत्ति हो तो उसे बचाने-बढ़ने क़ी इच्छा आदमी क़ी नींद छीन लेती है..
फिर भी यदि हम सही आकलन करे तो पैसे वाला होने के मुकाबले पैसे वाला न होना ज्यादा अच्छा है.मैं व्यक्तिगत रूप से दोनों तरह के लोगो को जानती हूँ और उनकी जिंदगी देखकर कह सकती हूँ कि जिनके पास पैसे नहीं हैं वे रात को अपने खुले असुरक्षित घर में चैन से सोते हैं.दिन भर मेहनत कर  शाम को जब दो रोटी खाते हैं तो उन्हें उसमे प्यार की महक आती है,जबकि पैसे वाला परिवार जब खाना खाने बैठता है तो उसे उसमे साजिश कि बदबू आती है और घर पूरी तरह सुरक्षित होने पर भी आँखों से नींद कोसो दूर रहती है,ऐसे में मेरा मन तो यही कहता है कि ऐसी संपत्ति जो सिरदर्द बने भगवान मुझे मत दे.मेरे जीवन में प्यार की महक रहने दे.

1 टिप्पणी:

shikha kaushik ने कहा…

bilkul sahi kaha ! depotsav ki hardik shubhkamnayen !

हस्ती ....... जिसके कदम पर ज़माना पड़ा.

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