man kya kare?

ये मन मछली क्यों तैरती है हवा में,
 जबकि मछली का जीवन तो पानी है.
ये क्यों बनाती है हवा में महल,
 जबकि धरती तो महलों की रानी है.
यहाँ सोचते हैं सब अपनी ही अपनी,
 कहाँ सोचता कोई दूजे की कहानी है .
जो ना काम किसी के आ सकी ,
 क्या वो भी कोई जवानी है?
ये दुनिया धन के नशे में डूबी,
 ये दौलत के पीछे दीवानी है.
इससे जरा हटकर सोचो,
 क्या तुम्हे भी जिंदगी गँवानी है?

टिप्पणियाँ

क्षितिजा .... ने कहा…
अच्छे प्रश्न पर छोड़ा है आपने रचना को .... सोच को सही दिशा देना आवश्यक है .... बहुत खूब ...
वन्दना ने कहा…
यक्ष प्रश्न्।
आपका ब्लाग सूचनाप्रद है, लिखती भी अच्छा हैं। भावनाओं को काव्य के सहारे व्यक्त करने का प्रयास सराहनीय है। जितना उत्साह रहेगा, सफलता उतनी ही नजदीक आएगी। एक लायर का कविताओं के प्रति रुझान और भी अच्छा है। मेरे ब्लाग की भी यात्रा करें, अच्छा लगेगा।
प्रेम सरोवर ने कहा…
Aapke udgar bhavpurn hain.Yaad rakhne wali bat yeh hai ki parhit saris dharam nahi bhai hi is jivan ka uddeshya hona chahiye. Badhai.
is paise ke pichhe bhagti daudti duniya me aapki ye kavitaa ..aah .. man ko choo gayi... bahut sundar bhav aur sandesh..

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