man kahin aur chal............

बढ़ते भ्रष्टाचार पर बोलें सारे दल,
अपने को पावन कहें दूजे को दलदल.

जो भी देखो कर रहा एक ही जैसी बात,
भ्रष्टाचार के छा रहे भारत में बादल.

जनता के हितों की खातिर करते हैं ये सब,
कहते ऐसी ही बातें मंच को बदल-बदल.

देश की खातिर कर रहे जो ये देखो आज,
कोई नहीं कर पायेगा चाहे आये वो कल.

सत्ता की मदहोशी में बहके नेतागण,
बोले उल्टा-पुल्टा ही मन कहीं और चल.


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टिप्पणियाँ

Kunwar Kusumesh ने कहा…
वाह क्या बात है

netaon ke baare men bilkul sahi kaha aapne
Mukesh Kumar Sinha ने कहा…
fully agreed..............ek dum sach kaha aapne
ye do-muhan saanp hain...!!

achchhi abhivyakti..
follow karne laga hoon, ab barabar aaunga..kabhi hamare blog pe aayen..
S.M.HABIB ने कहा…
बढ़िया saamayik ग़ज़ल के लिए आभार स्वीकारें.
अनुपमा पाठक ने कहा…
सटीक लिखा है !
ZEAL ने कहा…
.

सही कह रहे हैं आप !

.
Dorothy ने कहा…
अपने आस पास के परिवेश में मौजूद विसंगतियों और कटु सच्चाईयों से रू-ब-रू कराती, भावपूर्ण और सटीक अभिव्यक्ति, जो किसी को भी सोचने के लिए विवश कर दे. आभार.
सादर,
डोरोथी.
शालिनी कौशिक जी
नमस्कार !

अच्छे काव्य प्रयास के लिए आभार !
पूरी कविता का सार लगा …
मन कहीं और चल !

छंद को थोड़ा-सा और साध लें … और भी आनन्द आएगा ।

शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार
shalini kaushik ने कहा…
kunver kusumesh ji,mukesh ji,s.m.habeeb ji,anupmaji,zeal ,dorothy ji,mere utsah verdhan hetu dhanyawad.
rajendra ji aapke margdarshan se shayad mere jaisee nai nai kaviyatri bhi kuchh seekh payegi .apna aashirvad mere liye banaye rakhen .
क्षितिजा .... ने कहा…
bahut khoob ... rachna aaj kal ke haalaat ka aaina hai ...

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