मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

हर पार्टी ही रखे करिश्माई अदा है .

 

सियासत आज की देखो ज़ब्तशुदा है ,
हर पार्टी ही रखे करिश्माई अदा है .


औलाद कहीं बेगम हैं डोर इनकी थामे ,
जम्हूरियत इन्हीं के क़दमों पे फ़िदा है .


काबिल हैं सभी इनमे ,है सबमें ही महारत ,
पर घंटी बांधने को बस एक बढ़ा है .


इल्ज़ाम  धरें माथे ये अपने मुखालिफ के ,
पर रूप उनसे इनका अब कहाँ जुदा है .


आगे न इनसे कोई ,पीछे न खड़ा कोई ,
पर वोट-बैंक इनका अकीदत से बंधा है .

बाहर भी बैठते हैं ,भीतर भी बैठते हैं ,
मुखालफ़त का जिम्मा इनके काँधे लदा है .


जादू है ये सियासत अपनाई सब दलों ने ,
''शालिनी'' ही नहीं सबको लगती खुदा है .

            शालिनी कौशिक
                   [कौशल]

7 टिप्‍पणियां:

sunil arya ने कहा…

wah wah bahut khoob....
औलाद कहीं बेगम हैं डोर इनकी थामे ,
जम्हूरियत इन्हीं के क़दमों पे फ़िदा है .

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

वाह !!! बहुत उम्दा गजल,के लिए बधाई शालिनी जी,,,

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Rajendra Kumar ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन रचना,आभार.

राजनीति के रंग हैं निराले
चलते हैं शब्दों तीर और भाले

दिगम्बर नासवा ने कहा…

इल्ज़ाम धरें माथे ये अपने मुखालिफ के ,
पर रूप उनसे इनका अब कहाँ जुदा है ...

वाह .. जबरदस्त ... हर शेर राजनीति के अखाड़े से बैठ के लिहा हुआ सा ..
लाजवाब ...

Bhola-Krishna ने कहा…


अति सार्थक चिंतन और मधुर अभिव्यक्ति
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मगर सच यही है जो 'गीता'(#) बताती
"फकत "वे" नहीं शालिनी भी 'खुदा' है"
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(#) "ईश्वरः सर्व भूता ------"
खुदा हाफ़िज़ बेटा - खुश रहिये !

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

बहुत बढिया
क्या बात

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बेहतरीन गजल..

... पता ही नहीं चला.

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