हर पार्टी ही रखे करिश्माई अदा है .

 

सियासत आज की देखो ज़ब्तशुदा है ,
हर पार्टी ही रखे करिश्माई अदा है .


औलाद कहीं बेगम हैं डोर इनकी थामे ,
जम्हूरियत इन्हीं के क़दमों पे फ़िदा है .


काबिल हैं सभी इनमे ,है सबमें ही महारत ,
पर घंटी बांधने को बस एक बढ़ा है .


इल्ज़ाम  धरें माथे ये अपने मुखालिफ के ,
पर रूप उनसे इनका अब कहाँ जुदा है .


आगे न इनसे कोई ,पीछे न खड़ा कोई ,
पर वोट-बैंक इनका अकीदत से बंधा है .

बाहर भी बैठते हैं ,भीतर भी बैठते हैं ,
मुखालफ़त का जिम्मा इनके काँधे लदा है .


जादू है ये सियासत अपनाई सब दलों ने ,
''शालिनी'' ही नहीं सबको लगती खुदा है .

            शालिनी कौशिक
                   [कौशल]

टिप्पणियाँ

sunil arya ने कहा…
wah wah bahut khoob....
औलाद कहीं बेगम हैं डोर इनकी थामे ,
जम्हूरियत इन्हीं के क़दमों पे फ़िदा है .
वाह !!! बहुत उम्दा गजल,के लिए बधाई शालिनी जी,,,

Recent post : होली की हुडदंग कमेंट्स के संग
Rajendra Kumar ने कहा…
बहुत ही बेहतरीन रचना,आभार.

राजनीति के रंग हैं निराले
चलते हैं शब्दों तीर और भाले
इल्ज़ाम धरें माथे ये अपने मुखालिफ के ,
पर रूप उनसे इनका अब कहाँ जुदा है ...

वाह .. जबरदस्त ... हर शेर राजनीति के अखाड़े से बैठ के लिहा हुआ सा ..
लाजवाब ...
Bhola-Krishna ने कहा…

अति सार्थक चिंतन और मधुर अभिव्यक्ति
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मगर सच यही है जो 'गीता'(#) बताती
"फकत "वे" नहीं शालिनी भी 'खुदा' है"
=============================
(#) "ईश्वरः सर्व भूता ------"
खुदा हाफ़िज़ बेटा - खुश रहिये !
बहुत बढिया
क्या बात

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