सोमवार, 15 अप्रैल 2013

दादा साहेब फाल्के और भारत रत्न :राजनीतिक हस्तक्षेप बंद हो .


'' कुछ  छंद उन्हें अर्पित मेरे जिनके पाँव में छाले हैं ,
 जो घोर अराजकता में भी मानवता के रखवाले हैं .''
 

''प्राण के लिए प्रणव से प्रोटोकॉल तोड़ने की अपील  ''समाचार केवल अभिनेता मनोज कुमार की मार्मिक अपील ही नहीं है अपितु एक तमाचा है हमारे लोकतंत्र पर ,जहाँ ''जनता की ,जनता के द्वारा,जनता के लिए सरकार शासन करती है .जहाँ जनता की ही अनदेखी है ,जनता के ही साथ अन्याय है .हिरण्यगर्भा ,रत्नों की खान हमारा देश रत्नों का सम्मान करना जानता ही नहीं है .प्राण जैसे अभिनेता को जीते जी दादा साहेब फाल्के घोषित कर दिया गया किन्तु ये बहुत देर से किया गया है

प्राण साहब को यह अवार्ड मिलने में देरी हुई'

Bollywood congratulates Pran on Phalke award, feels honour too late
Updated on: Sat, 13 Apr 2013 04:16 PM (IST)
         
मुंबई। बॉलीवुड में गुजरे जमाने के दमदार विलेन प्राण को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिलने की घोषणा का पूरे बॉलीवुड ने स्वागत किया है। हालांकि कुछ ने यह भी कहा है कि यह सम्मान उन्हें काफी देर से मिल रहा है। ऋषि कपूर ने उन्हें इस सम्मान को मिलने पर खुशी ... और पढ़ें » 
और क्या ये न्याय है कि पहले एक रत्न स्वरुप शख्सियत को बदतर स्थिति में पहुंचा दिया जाये और फिर जब वह अपने कार्यों के सम्मान की ख़ुशी महसूस करने की स्थिति में ही न रहे तब उसे ये सम्मान दे अपने उत्तरदायित्व की इति श्री कर ली जाये ?
   प्राण से पूर्व राजकपूर जी को भी जब ये पुरुस्कार दिया गया तब भी उन्हें ये पुरुस्कार देने राष्ट्रपति महोदय को मंच से नीचे आना पड़ा था ,बस इतनी ही राहत थी कि वे स्वयं वहां पुरुस्कार लेने पहुँच गए थे .
  एक देश जहाँ अपनी सरकार है वहां इस तरह की लापरवाही आम जानता के ही साथ की जाती है तो सवाल तो उठने लाज़मी हैं और ऐसे में यही कहा जायेगा कि यहाँ भेदभाव की राजनीति है .
  देश का सबसे बड़ा नागरिक पुरुस्कार जितनी तत्परता से ''नेहरु गाँधी परिवार ''को दिया जाता है वैसी शीघ्रता कहीं और दृष्टिगोचर नहीं होती .भारतीय राजनीति में इस परिवार से जितने भी प्रधानमंत्री हुए सभी को यह सम्मान दे दिया गया है अगर यह सम्मान सभी प्रधानमंत्री प्राप्त कर चुके होते तो कोई बात नहीं थी किन्तु ऐसा नहीं है क्योंकि बहुत से प्रधानमंत्री इसकी चयन समिति के बनाये मानक शायद पूरे नहीं करते या फिर वे इनकी ''गुड बुक ''में नहीं हैं .
   भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी एक ओर जहाँ देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्रियों में से एक हैं   और अपने कार्यकाल की उपलब्धियों -पोखरण परमाणु परीक्षण ,कारगिल युद्ध में विजय ,इस्राइल से सम्बन्ध बढ़ाने आदि के कारण इस पुरुस्कार के सर्वश्रेष्ठ पात्रों में हैं .यही नहीं किसानों की आवाज को देश के सिंघासन से जोड़ने वाले चौधरी चरण सिंह जी की भी इस पुरुस्कार के लिए दावेदारी को ख़ारिज करना भी किसी हुक्मरान के वश में नहीं है ऐसे ही बहुत से ऐसे नाम हैं जिनके नामों पर न तो आज तक विचार किया गया न ही उन्हें ये पुरुस्कार देने में असमर्थता का कोई कारण ही बताया गया .
दादा साहेब फाल्के अवार्ड सूची       भारत रत्न अवार्ड सूची   
भारत रत्न व् दादा साहेब फाल्के ,ये दोनों ही सम्मान हमारे यहाँ राजनीतिक इच्छा शक्ति के अधीन हैं और इसका खामियाजा हमारे बहुत से इन पुरुस्कारों के योग्य पात्रों को भुगतना पड़ता है अभी हाल ही में पूर्व न्यायाधीश मारकंडे काटजू ने उर्दू में एक शायर के रूप में किवंदिती बन चुके ग़ालिब का नाम इस पुरुस्कार के लिए प्रस्तावित किया है ऐसे ही हम कह सकते हैं कि अटल जी ,इंद्र कुमार गुजराल जी ,चरण सिंह जी ,और भी  जाने कितने नाम इस पुरुस्कार के पात्रों के रूप में हमें दिखते हैं किन्तु हमारे इन सत्ताधारियों को नहीं दिखते जिन्होंने २००८ के बाद से रविशंकर जी को देने के बाद से इस पर रोक सी ही लगा रखी है .अभी हुए कुछ हंगामे के बाद खिलाडियों के लिए भी इसमें स्थान किया गया नहीं तो विश्व में भारत का नाम रोशन करने वाले इन उदीयमान सितारों के लिए इसमें कोई स्थान नहीं रखा गया था फिर नेताओं के लिए ही क्यों रखा गया जबकि इनसे तो देश का नाम तक किसी को पता नहीं चलता .इसका प्रमाण यह है कि जब जोर्ज बुश से भारत के पी.एम्.का नाम पूछा गया तो उन्हें अटल जी का नाम पता ही नहीं था फिर इन्हें यहाँ स्थान क्यों दिया गया और इन पुरुस्कारों का कौन पात्र है कौननहीं इसके लिए  देश से सुझाव आमंत्रित किये जाने चाहिए न कि राजनीतिक इच्छा शक्ति के आगे सिर झुकाना चाहिए .
राजनीतिक इच्छाशक्ति के अधीन होने के कारण ही जो योग्यता सत्ताधारी दल की पसंद होती है वह पुरुस्कार प्राप्त कर लेती है और अन्य अंधेरों में ही भटकती रह जाती हैं .वे तो यही कहती होंगी-
''डिग्री ,मेहनत और योग्यता रखी रही बेकार गयी ,
उनकी हर तिकड़म रंग लायी ,हम शराफत मार गयी .''
जब प्राण जी भारतीय फिल्मो के शुरूआती दौर से जुड़े हुए हैं तो २००४ से उनके नाम पर विचार करते रहने के बावजूद २ ० १ ३ में ये घोषणा शायद उनकी तबियत को देखते हुए ही की गयी है ताकि एक भलाई के काम को अपने खाते में जोड़कर वाहवाही हासिल की जाये बस खैर ये है कि उनके जीवित रहते हुए ये मौजूदा सरकार ने बहती गंगा में हाथ धो लिए किन्तु क्या यह सरकार आगे अपनी कार्यप्रणाली  में सुधार लाएगी और उनके लिए प्रोटोकॉल तोड़ने की अपील करने वाले मनोज कुमार जी के लिए इस पुरुस्कार हेतु समय से विचार करेगी .मनोज जी तो मात्र एक उदाहरण  हैं हमारी फिल्म इंडस्ट्री ऐसे हीरों से भरी पड़ी है .राजेश खन्ना अब हमारे बीच में नहीं हैं वास्तव में वे नाना बन गए किन्तु इस फिल्म पुरस्कार के योग्य अभी बनने के लिए उन्हें और उम्र चाहिए थी किन्तु नहीं मिली ,कोई बात नहीं मृत्योपरांत अपने मकसद हल करने के लिए इस पुरस्कार की भी व्यवस्था है भले ही कलाकार को वास्तविक सम्मान मिले न मिले ,अमिताभ बच्चन फिल्म जगत में एक विराट व्यक्तित्व रखते हैं किन्तु कब इस पुरस्कार के योग्य होंगे ,पता नहीं और भी बहुत से नाम हैं किन्तु राजनीतिक हस्तक्षेप किसे इसके योग्य बनाएगा नहीं पता .
   ऐसे ही भारत रत्न में विषमता है यूँ तो गाँधी नेहरु परिवार का इस देश के लिए किया गया त्याग उन्हें यहाँ के नागरिकों के मन में सम्मानजनक स्थान दिलाता है किन्तु यह किसी पुरुस्कार की कसौटी नहीं होता और इस परिवार को इस पुरुस्कार में शत-प्रतिशत स्थान मिला हुआ है और दुखद बात तो यह है कि चयन समिति इनके आभा मंडल से इस कदर बंधी है कि जवाहर जी के साथी रहे सरदार पटेल को उनके धेवते राजीव गाँधी के साथ इस पुरस्कार के योग्य माना गया जबकि अपने देश सेवा के लिए किया गए कार्यों के लिए वे जवाहर जी से भी पूर्व उन्हें पाने की योग्यता रखते थे ऐसे ही देश के लिए अपना जीवन अर्पण करने वाले नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को तो इनसे भी बाद में यद् किया गया १९९२ में और योग्यता की अनदेखी कोई बर्दाश्त कर लेता है कोई नहीं और ऐसा ही यहाँ हुआ और नेताजी के  परिजनों ने ये पुरस्कार लौटा दिया .राजनीतिक मह्तावाकंक्षा यदि इसी तरह योग्यता को अंधेरों में धकेलती रही तो या तो यह देश जनता के आक्रोश का शिकार होगा या फिर योग्यता के गुम होने का ,इसलिए अब समय आ गया है कि इस व्यवस्था में परिवर्तन किया जाये और ऐसे पुरुस्कारों को राजनीति से दूर किया जाये और जनता के निर्णय के करीब.सत्यपाल [सत्यम ]जी के शब्दों में -
   ''अंजाम बदल जायेगा गर तुम आगाज़ बदल दो ,
     जो दर्द नहीं सुनता ऐसा हर राज बदल दो .''
         शालिनी कौशिक
                   [कौशल ]






9 टिप्‍पणियां:

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

देर से आए दुरुस्त आये,,,

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डॉ शिखा कौशिक ''नूतन '' ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति . हार्दिक आभार नवसंवत्सर की बहुत बहुत शुभकामनायें हम हिंदी चिट्ठाकार हैं

BHARTIY NARI
PLEASE VISIT .

Anil Dayama 'Ekla' ने कहा…

किसी को सम्मान देने पर भी राजनीती खेलते हैं हमारे सत्ताधारी ..इससे योग्य व्यक्ति के प्रति अन्याय हो रहा है।

ब्लॉग पर मेरी मेरी पहली पोस्ट : : माँ
(नया नया ब्लॉगर हूँ तो ...आपकी सहायता की महती आवश्यकता है .. अच्छा लगे तो मेरे ब्लॉग से भी जुड़ें।)

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

चलिये, मिल तो गया..

abhishek shukla ने कहा…

दुर्भाग्य है भारत वासियों का, खुद के लिए सरकार चुनते तो हैं पर जब सरकार बन जाती है तो इन्हें ही हाशिये पे रख देती है और चुनो मुझे सरकार,
www.omjaijagdeesh.blogspot.com

कालीपद प्रसाद ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति !
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Anita ने कहा…

समसामयिक पोस्ट..

Rajendra Kumar ने कहा…

ये पुरष्कार बहुत पहले मिल जाना चाहिए था,आभार.
"महिलाओं के स्वास्थ्य सम्बन्धी सम्पूर्ण जानकारी
"

HARSHVARDHAN ने कहा…

यह पुरस्कार बहुत पहले प्राण जी को मिल जाना चाहिए था। ऐसे ही कितनी महान शख्सियत है जिन्हें "भारत रत्न" और "दादा साहेब फाल्के पुरस्कार" बहुत पहले ही मिल जाना चाहिए था। सुन्दर लेख। धन्यवाद।

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