शनिवार, 16 मई 2015

''हिन्दू-मुस्लिम भेद-समझ-समझ का फेर ''


एक सार्वभौमिक सत्य के बारे में आप सभी जानते ही होंगें कि दूध गाय -भैंस ही देती हैं और जहाँ तक हैं इनका कोई धर्म जाति नहीं होती ,इनमे आपस में होती हो तो पता नहीं किन्तु जहाँ तक इंसान की बात है वह इस सम्बन्ध में  कम से कम मेरी जानकारी के अनुसार तो अनभिज्ञ ही कहा जायेगा .
पर आज मेरी यह जानकारी धरी की धरी रह गयी जब मैंने अपने पड़ोस में रहने वाली आंटी जी को पड़ोस की ही दूसरी आंटी जी से बात करते सुना ,वे उनसे दूध के बारे में पूछ रही थी और ये  बता रही थी कि उन्हें अपने यहाँ के एक धार्मिक समारोह के लिए ज्यादा दूध की आवश्यकता है। दूसरी आंटी  के ये कहने पर कि उनका दूधवाला बहुत अच्छा दूध लाता है पर वे फटाक से बोली लाता तो हमारा दूधवाला भी बहुत बढ़िया दूध है पर वह मुसलमान है ना ,......................................................आश्चर्य से हक्की-बक्की रह गयी मैं उनकी इस बात पर कि वे दूधवाले के मजहब से दूध-दूध में भेद कर रही हैं जबकि उन्हें दूध चाहिए था जो या तो गाय देती है या भैंस ,आज तक दूध के मामले में गाय-भैंस का अंतर तो सुना था पर हिन्दू-मुसलमान का अंतर कभी नहीं, मन में विचार आया कि फिर क्या वे अपने यहाँ बनने वाले भोजन में भी हिन्दू-मुसलमान  का भेद करेंगी  जिसका ये पता नहीं कि वह हिन्दू के खेत की पैदावार है या मुसलमान के खेत की।
ये सोच-समझ का अंतर केवल इन्ही की सोच-समझ का ही नहीं है अपितु आमतौर पर देखने में मिलता है ;जैसे हिन्दू अपने यहाँ मिस्त्री का काम मुसलमान मिस्त्री से भी करा लेते हैं किन्तु मुसलमान अपने घर पर हिन्दू मिस्त्री नहीं लगाते ,जैसे मुसलमान हिन्दू की थाली में बिना भेद किये खा लेते हैं जबकि हिन्दू मुसलमान की थाली इस्तेमाल करते हिचकिचाते हैं।
हिन्दू मुसलमान का यह वैचारिक मतभेद मिटना मुश्किल है क्योंकि मुसलमान यहाँ अपने को असुरक्षित महसूस करते हैं और हिन्दू इनकी जीवनचर्या को अपने सिद्धांतों के विपरीत और ये सोच का अन्धकार शिक्षा का उजाला भी दूर करने में अक्षम है और यही देश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने का हमारे नेताओं को मौका देता है जिसे इन नेताओं के हाथ से छीनना इन सोच-समझ की परिस्थितियों में नामुमकिन नहीं तो कठिन अवश्य है और इस मुश्किल को केवल आपसी समझ-बूझ से ही ख़त्म किया जा सकता है। जब गाय को मुसलमान के पास रहकर अपना पालन-पोषण कराने व् दूध देने में आपत्ति नहीं तो हम गाय-भैंस की वजह से हिन्दू-मुसलमान का अंतर क्यूँ कर रहे हैं और यही समझ-बूझ हमें विकसित करनी होगी जैसे कि आपने भी पढ़ा-सुना होगा ठीक ऐसे ही -
''खुदा किसी का राम किसी का ,
बाँट न इनको पाले में।
तू मस्जिद में पूजा कर ,
मैं सिज़दा करूँ शिवाले में।
जिस धारा में प्यार-मुहब्बत ,
वह धारा ही गंगा है।
और अन्यथा क्या अंतर ,
वह यहाँ गिरी या नाले मे। ''
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

6 टिप्‍पणियां:

satya sheel Agrawal ने कहा…

एक सार गर्भित लेख

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (18-05-2015) को "आशा है तो जीवन है" {चर्चा अंक - 1979} पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
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Neetu Singhal ने कहा…

>> पशु-पक्षियों की भी जाति होती है मूर्खों की भाषा में उसे नस्ल कहते हैं.....

ये बिदेसी लोग हमारी सीखते हैं अपनी सिखाते हैं.....

रचना दीक्षित ने कहा…

अच्छा लगा आपका ये लेख पढ़ना
आभार

dj ने कहा…

सच कहा आपने "ये सोच का अन्धकार शिक्षा का उजाला भी दूर करने में अक्षम है "
न जाने वो कौन सा तरीका है जिससे इस सोच को मिटाया जा सकता है।

Rangraj Iyengar ने कहा…

शालिनी जी,
आपकी बात तो सौ फीसदी सच है. इसे मिटाने के लिए प्रयत्न करना होगा. जबकि हमाने मान्यों ने इसे बढ़ाने के प्रयत्न किए हैं और कर रहे हैं ताकि उनके वोट बचे रहें. जब तक वह नस्ल नहीं सुधरेगी, इस समस्या का समाधान शायद हो नहीं पाएगा.

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