खादिम है तेरा खाविंद ,क्यूँ सिर चढ़े पड़ी हो .


क्यूँ खामखाह में ख़ाला,खारिश किये पड़ी हो ,
खादिम है तेरा खाविंद ,क्यूँ सिर चढ़े पड़ी हो .
…………………………
ख़ातून की खातिर जो ,खामोश हर घड़ी में ,
खब्ती हो इस तरह से ,ये लट्ठ लिए पड़ी हो .
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खिज़ाब लगा दिखते,खालू यूँ नौजवाँ से ,
खरखशा जवानी का ,किस्सा लिए पड़ी हो .
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करते हैं खिदमतें वे ,दिन-रात लग तुम्हारी ,
फिर क्यूँ न मुस्कुराने की, जिद किये पड़ी हो .
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करते खुशामदें हैं ,खुतबा पढ़ें तुम्हारी ,
खुशहाली में अपनी क्यूँ,खंजर दिए पड़ी हो .
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खिलवत से दूर रहकर ,खिलक़त को बढ़के देखो ,
क्यूँ खैरियत की अपनी ,खिल्ली किये पड़ी हो .
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ऐसे खाहाँ की खातिर ,रोज़े ये दुनिया रखती ,
पर खामख्याली में तुम ,खिसियाये हुए पड़ी हो .
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खुद-इख़्तियार रखते ,खुसिया बरदार हैं फिर भी ,
खूबी को भूल उनकी ,खटपट किये पड़ी हो .
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क्या जानती नहीं हो ,मजबूरी खुद खसम की ,
क्यूँ सारी दुख्तरों को ,सौतन किये पड़ी हो .
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''शालिनी '' कहे खाला,खालू की कुछ तो सोचो ,
चढ़ते वे कैसे ऊपर ,जब बेंत ले पड़ी हो .
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शालिनी कौशिक
[WOMAN ABOUT MAN]
शब्दार्थ :-खाविंद-पति ,खातून-पत्नी ,खाला-मौसी ,खालू-मौसा खारिश -खुजली ,खुसिया बरदार -सभी तरह की सेवा करके खुश रखने वाला ,खर खशा-व्यर्थ का झगडा ,खाहाँ-चाहने वाला ,खिलवत -एकांत ,खिलक़त-प्रकृति ,खामख्याली -नासमझी

टिप्पणियाँ

Mithilesh dubey ने कहा…
लाजवाब रचना। अच्छा लगा पढ़कर

http://chlachitra.blogspot.in
http://cricketluverr.blogspot.in
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (31-05-2015) को "कचरे में उपजी दिव्य सोच" {चर्चा अंक- 1992} पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, क्लर्क बनाती शिक्षा व्यवस्था - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !
ऋषभ शुक्ला ने कहा…
sundar rachna..........
Onkar ने कहा…
बढ़िया ग़ज़ल

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