मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

दाता ही थैला लेके उसके ठौर आ गया है .


तब्दीली का जहाँ में अब दौर आ गया है ,
कुदरत के ख़त्म होने का दौर आ गया है .
..........................................................
पहले भिखारी फिरते घर घर कटोरा लेकर ,
दाता ही थैला लेके उसके ठौर आ गया है .
...............................................................
प्यासा भटकता था कभी कुएं की खोज में ,
अब कुआं उसके दर पे ले चौंर आ गया है .
...............................................................
तप करते थे वनों में पाने को प्रभु भक्ति ,
खुद रब को अनासक्तों का गौर आ गया है .
..........................................................................
भगवन ये पूछते थे क्या मांगते हो बेटा,
बेटे के बिना मांगे मुंह में कौर आ गया है .
...........................................................................
दुनिया में तबाही का यूँ आ रहा है मंज़र ,
पतझड़ के समय पेड़ों पर बौर आ गया है .
....................................................................
ऊँगली उठाना आसाँ मुश्किल है काम करना ,
''शालिनी ''की समझ में ये तौर आ गया है .
.......
शब्दार्थ-ठौर-ठिकाना ,चौंर-चंवर ,कौर-निवाला .
.....
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (18-12-13) को चर्चा मंच 1465 :काना राजा भी भला, हम अंधे बेचैन- में "मयंक का कोना" पर भी है!
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Ramakant Singh ने कहा…

भगवन ये पूछते थे क्या मांगते हो बेटा,
बेटे के बिना मांगे मुंह में कौर आ गया है .

आपको समर्पित
रही नाव चलाये माझी जाये पार
भक्त अर्पण के लिए प्रतिमा लाये हार

रविकर ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति-
आभार आपका-

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सार्थक बदलाव को इंगित करती रचना।

.............तभी कम्बख्त ससुराली ,

थी कातिल में कहाँ हिम्मत  ,मुझे वो क़त्ल कर देता  ,         अगर  मैं  अपने  हाथों  से  ,न  खंजर  उसको  दे  देता  . .....................