बुधवार, 4 जून 2014

बेटी ऐसा जन्म न चाहे

Your Pregnancy, Week by Week
हुआ है आज भी देखो 
एक और क़त्ल 
पर कहीं किसी चेहरे पर 
विषाद की छाया नहीं !
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हर तरफ राहत 
हो रही महसूस 
जैसे किसी बहुत बड़ी 
विपदा से मिली मुक्ति !
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कोई कह रहा 
चलो सारे जीवन भर का बोझ हटा 
कोई कह रहा 
हज़ार झंझट दूर हो गए !
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देश का ,समाज का ,परिवार का 
कितना हुआ भला 
नहीं समझ पा रहे 
बस पालन-पोषण,शिक्षा -दहेज़ 
के खर्च को बचाने में 
खुद को सफल मान रहे !
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कन्या-भ्रूण हत्या का 
स्वयं वह भ्रूण जो 
जन्म न पा सका 
मान रहा उपकार सभी का !
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अच्छा किया जो मुझे ख़त्म कर दिया 
लड़की होने के अभिशाप से 
मुझको बचा लिया .
मैं बची लड़की होने के ताने से ,
लड़कों के अभद्र गानों से ,
अपनी इच्छाएं दबाने से ,
दहेज़ में जलाने से ,
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और समाज बचा 
औरत की रखवाली से ,
उसको मिलती गाली से ,
बलात्कार बीमारी से ,
लुटती पिटती नारी से !
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देश भी देगा तुम्हें दुआएं ,
जनसँख्या न अब बढ़ पाये ,
बेटी कल को माँ ही बनती ,
बेटी नहीं तो दूर बलायें ,
जनसँख्या जब थम जाएगी ,
तभी तरक्की मिल पायेगी .
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देश ,समाज ,परिवार तुम्हारा रहे कृतज्ञ सदा कातिलों ,
बेटी ऐसा जन्म न चाहे जिसमे जीवन ही न मिलो .
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शालिनी कौशिक 
[कौशल ] 



6 टिप्‍पणियां:

राजेंद्र कुमार ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (06.06.2014) को "रिश्तों में शर्तें क्यों " (चर्चा अंक-1635)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

Neeraj Kumar Neer ने कहा…

बहुत ही मार्मिक एवं सुंदर प्रस्तुति

Dr. sandhya tiwari ने कहा…

samaj ke katu stya par sundar rachna ..............

Pratibha Verma ने कहा…

अच्छा किया जो मुझे ख़त्म कर दिया
लड़की होने के अभिशाप से
मुझको बचा लिया .
मैं बची लड़की होने के ताने से ,
लड़कों के अभद्र गानों से ,
अपनी इच्छाएं दबाने से ,
दहेज़ में जलाने से ,

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

sadhana vaid ने कहा…

कितनी पीड़ा है हर शब्द में ! अत्यंत मर्मस्पर्शी एवं अंतस को झकझोरती रचना !

आशा जोगळेकर ने कहा…

बेटी ऐसा जन्म न चाहे जिसमें जीवन ही न मिले।
बहुत मार्मिक।

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