रविवार, 21 अक्तूबर 2012

जैसे पिता मिले मुझे ऐसे सभी को मिलें ,

                              
झुका दूं शीश अपना ये बिना सोचे जिन चरणों में ,
ऐसे पावन चरण मेरे पिता के कहलाते हैं .
बेटे-बेटियों में फर्क जो करते यहाँ ,
ऐसे कम अक्लों को वे आईना दिखलाते हैं .
शिक्षा दिलाई हमें बढाया साथ दे आगे ,
मुसीबतों से हमें लड़ना सिखलाते हैं .
मिथ्या अभिमान से दूर रखकर हमें ,
सादगी सभ्यता का पाठ वे पढ़ाते हैं .
कर्मवीरों की महत्ता जग में है चहुँ ओर,
सही काम करने में वे आगे बढ़ाते हैं .
जैसे पिता मिले मुझे ऐसे सभी को मिलें ,
अनायास दिल से ये शब्द निकल आते हैं .
                शालिनी कौशिक 
                       [कौशल] 

6 टिप्‍पणियां:

Vinay Prajapati ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता है

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अपने ब्लॉग को ई-पुस्तक में बदलिए

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

एक पिता को सब हैं प्यारे,
सब उसकी आँखों के तारे।

Manu Tyagi ने कहा…

सुंदर रचना , पिता के प्रति बढिया भाव

रविकर ने कहा…

शुभकामनायें-

bhola.krishna@gmail .com ने कहा…

माता-पिता - दोनों के प्रति आपकी मधुर
अभिव्यक्ति , दिल छू गयी ! आपका कथन अक्षरशः सत्य है , न केवल आपके और हमारे लिए वरन समग्र मानवता के लिए ! बेटा ,प्रभु ,नजर नवाजे [दृष्टि दान] दे उन्हें जो देख नहीं पाते हैं माता पिता का यह अनुपम मधुर स्वरूप ! बेटा ! आप आयना दिखा रहीं हैं उसके लिए हार्दिक धन्यवाद !आशीर्वाद !
भोला अंकल - कृष्णा आंटी [यू एस ए ]

kshama ने कहा…

Bahut khush qismat hain aap!

संभल जा रे नारी ....

''हैलो शालिनी '' बोल रही है क्या ,सुन किसी लड़की की आवाज़ मैंने बेधड़क कहा कि हाँ मैं ही बोल रही हूँ ,पर आप ,जैसे ही उसने अपन...