बुधवार, 3 अक्तूबर 2012

अरविन्द की पार्टी :क्या अलग है इसमें -कुछ नहीं

अरविन्द की पार्टी :क्या अलग है इसमें -कुछ नहीं


''सुविधाएँ सारी घर में लाने के वास्ते , लोगों ने बेच डाला अपना ईमान अब ,
आखिर परों को काटकर सैय्याद ने कहा ,हे आसमां खुली भरो ऊँची उड़ान अब .''
नहीं जानती कि  ये शेर किस मारूफ़ शायर का है किन्तु आज सुबह समाचार पत्रों में जब अरविन्द केजरीवाल की पार्टी की विशेषताओं को पढ़ा तो अरविन्द एक सैय्याद ही नज़र आये .जिन नियमों को बना वे अपनी पार्टी को जनता के द्वारा विशेष दर्जा दिलाना चाहते हैं वे ही उन्हें इस श्रेणी में रख रही हैं .उनके नियम एक बारगी ध्यान दीजिये -
   १-एक परिवार से एक सदस्य के ही चुनाव लड़ने का नियम .
२-पार्टी का कोई भी सांसद ,विधायक लाल बत्ती का नहीं करेगा इस्तेमाल .
३-सुरक्षा और सरकारी बंगला नहीं लेंगे सांसद ,विधायक .
४-हाईकोर्ट के सेवानिवृत जज करेंगे पार्टी पदाधिकारियों पर आरोपों की जाँच .
५-एक रूपये से उपर के सभी चंदे का हिसाब वेबसाईट पर डाला जायेगा .
   क्या केवल गाँधी परिवार से अपनी पार्टी को अलग रखने के लिए एक परिवार एक सदस्य का नियम रखा गया है ?जब वकील का बच्चा वकील और डॉक्टर का बच्चा डॉक्टर बन सकता है तो नेता का बच्चा नेता क्यूं नहीं बन सकता ?चुनना तो जनता के हाथ में है .अब किसी नेता के परिवार के सदस्य में यदि हमारे नेतृत्व की ईमानदार नेतृत्व की क्षमता है तो ये नियम हमारे लिए ही नुकसानदायक है और दूसरे इसे बना भ्रष्टाचार पर जंजीरें डालना अरविन्द का भ्रम है हमने देखा है कितने ही लोग एक परिवार के सदस्य न होते हुए भी देश को चूना लगते हैं और मिलजुल कर भ्रष्टाचार करते हैं एक व्यक्ति जो कि ठेकेदारी के व्यवसाय में है  नगरपालिका का सभासद बनता है तो दूसरा [उसका मित्र -परिवार का सदस्य नहीं ]कभी ठेकेदारी का कोई अनुभव न होते हुए भी नगरपालिका से ठेके प्राप्त करता है और इस तरह मिलजुल भ्रष्टाचार को अंजाम देते हैं क्या यहाँ अरविन्द का एक परिवार एक सदस्य  का नियम कारगर रहेगा ?
     लाल बत्ती का इस्तेमाल जनता के हितार्थ किया जाये तो इसमें क्या बुराई है कम से कम ये जनता के लिए एक पहचान तो है और इस पहचान को छीन वे कौन से भ्रष्टाचार को रोक पाएंगे ?
      सुरक्षा का न लेना ''झीना हिकाका ''वाली स्थिति पैदा कर सकता है क्या ये देश के लिए देश की सुरक्षा के लिए भारी नहीं पड़ेगा ?
और सरकारी बंगला जनता को नेता से जोड़ने के लिए है जिसके माध्यम से सांसद ,विधायक जनता से सीधे जुड़ते हैं और उनके  परिवार के जीवन में कोई अनधिकृत  हस्तक्षेप भी नहीं होता  इसलिए इस नियम को भी व्यर्थ के प्रलाप की श्रेणी में रखा जा सकता है .
    हाईकोर्ट जज द्वारा आरोपों की जाँच -क्या गारंटी है रिटायर्ड हाईकोर्ट जज के भ्रष्टाचारी न होने की ?क्या वे माननीय  पी.डी.दिनाकरण जी को भूल गए ?इसलिए ये नियम भी बेकार .
      एक रूपये से ऊपर के चंदे का हिसाब -अभी शाम ही एक मेडिकल स्टोर पर देखा एक उपभोक्ता को दवाई के पैसे देने थे २००/-रूपये और उसने दिए १-१ रूपये के सिक्के .अब जो चंदा हिसाब से बाहर रखना होगा वह कहने को ऐसे भी लिया जा सकेगा तो उसका हिसाब कहाँ रखा जायेगा इसलिए ये नियम भी बेकार .
     फिर अरविन्द केजरीवाल कह रहे हैं -''कि ये उनकी नहीं आम लोगों की पार्टी होगी ,जहाँ सारा फैसला जनता करेगी .''तो अरविन्द जी ये भारत है जहाँ लोकतंत्र है और जहाँ हर पार्टी जनता की ही है और हर नेता जनता के बीच में से ही सत्ता व् विपक्ष में पहुँचता है फिर इसमें ऐसी क्या विशेषता है जो ये भ्रष्टाचार के मुकाबले में खड़ी हो .अरविन्द जी के लिए तो एक शायर की ये पंक्तियाँ ही इस जंग के लिए मेरी नज़रों में उनके अभियान को सफल बनाने हेतु आवश्यक हैं-
  ''करें ये अहद कि औजारें जंग हैं जितने उन्हें मिटाना और खाक में मिलाना है ,
करें ये अहद कि सह्बाबे जंग हैं हमारे जितने उन्हें शराफत और इंसानियत सिखाना है .''
                                            शालिनी कौशिक  
                                                 [कौशल ]

13 टिप्‍पणियां:

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

नहीं जानती कि ये शेर(शैर ) किस मारूफ़ शायर का है किन्तु आज सुबह समाचार पत्रों में जब .....शैर

४-हाईकोर्ट के सेवानिवृत(सेवा -निवृत्त ) जज करेंगे पार्टी पदाधिकारियों पर आरोपों की जाँच ......निवृत्त

.५-एक रूपये से उपर(ऊपर ) के सभी चंदे का हिसाब वेबसाईट पर डाला जायेगा ......ऊपर
देश को चूना लगते(लगातें ) हैं.

इतना खौफ क्यों हैं ईमानदार लोगों और ईमानदारी का ?अभी पार्टी बनने दीजिए .ईमानदार लोगों में पहल की कमी रही है लेकिन उनका राजनीति में आना गैर -कानूनी कब है .आपसे एक ड्राफ्ट शुद्ध नहीं लिखा जाता और केजरीवाल पर ऊंगली उठाने चलीं हैं .
एक प्रतिक्रिया -


अरविन्द की पार्टी :क्या अलग है इसमें -कुछ नहीं
अरविन्द की पार्टी :क्या अलग है इसमें -कुछ नहीं



''सुविधाएँ सारी घर में लाने के वास्ते , लोगों ने बेच डाला अपना ईमान अब ,
आखिर परों को काटकर सैय्याद ने कहा ,हे आसमां खुली भरो ऊँची उड़ान अब .''
नहीं जानती कि ये शेर किस मारूफ़ शायर का है किन्तु आज सुबह समाचार पत्रों में जब अरविन्द केजरीवाल की पार्टी की विशेषताओं को पढ़ा तो अरविन्द एक सैय्याद ही नज़र आये .जिन नियमों को बना वे अपनी पार्टी को जनता के द्वारा विशेष दर्जा दिलाना चाहते हैं वे ही उन्हें इस श्रेणी में रख रही हैं .उनके नियम एक बारगी ध्यान दीजिये -
१-एक परिवार से एक सदस्य के ही चुनाव लड़ने का नियम .
२-पार्टी का कोई भी सांसद ,विधायक लाल बत्ती का नहीं करेगा इस्तेमाल .
३-सुरक्षा और सरकारी बंगला नहीं लेंगे सांसद ,विधायक .
४-हाईकोर्ट के सेवानिवृत जज करेंगे पार्टी पदाधिकारियों पर आरोपों की जाँच .
५-एक रूपये से उपर के सभी चंदे का हिसाब वेबसाईट पर डाला जायेगा .
क्या केवल गाँधी परिवार से अपनी पार्टी को अलग रखने के लिए एक परिवार एक सदस्य का नियम रखा गया है ?जब वकील का बच्चा वकील और डॉक्टर का बच्चा डॉक्टर बन सकता है तो नेता का बच्चा नेता क्यूं नहीं बन सकता ?चुनना तो जनता के हाथ में है .अब किसी नेता के परिवार के सदस्य में यदि हमारे नेतृत्व की ईमानदार नेतृत्व की क्षमता है तो ये नियम हमारे लिए ही नुकसानदायक है और दूसरे इसे बना भ्रष्टाचार पर जंजीरें डालना अरविन्द का भ्रम है हमने देखा है कितने ही लोग एक परिवार के सदस्य न होते हुए भी देश को चूना लगते हैं और मिलजुल कर भ्रष्टाचार करते हैं एक व्यक्ति जो कि ठेकेदारी के व्यवसाय में है नगरपालिका का सभासद बनता है तो दूसरा [उसका मित्र -परिवार का सदस्य नहीं ]कभी ठेकेदारी का कोई अनुभव न होते हुए भी नगरपालिका से ठेके प्राप्त करता है और इस तरह मिलजुल भ्रष्टाचार को अंजाम देते हैं क्या यहाँ अरविन्द का एक परिवार एक सदस्य का नियम कारगर रहेगा ?
लाल बत्ती का इस्तेमाल जनता के हितार्थ किया जाये तो इसमें क्या बुराई है कम से कम ये जनता के लिए एक पहचान तो है और इस पहचान को छीन वे कौन से भ्रष्टाचार को रोक पाएंगे ?
सुरक्षा का न लेना ''झीना हिकाका ''वाली स्थिति पैदा कर सकता है क्या ये देश के लिए देश की सुरक्षा के लिए भारी नहीं पड़ेगा ?
और सरकारी बंगला जनता को नेता से जोड़ने के लिए है जिसके माध्यम से सांसद ,विधायक जनता से सीधे जुड़ते हैं और उनके परिवार के जीवन में कोई अनधिकृत हस्तक्षेप भी नहीं होता इसलिए इस नियम को भी व्यर्थ के प्रलाप की श्रेणी में रखा जा सकता है .
हाईकोर्ट जज द्वारा आरोपों की जाँच -क्या गारंटी है रिटायर्ड हाईकोर्ट जज के भ्रष्टाचारी न होने की ?क्या वे माननीय पी.डी.दिनाकरण जी को भूल गए ?इसलिए ये नियम भी बेकार .
एक रूपये से ऊपर के चंदे का हिसाब -अभी शाम ही एक मेडिकल स्टोर पर देखा एक उपभोक्ता को दवाई के पैसे देने थे २००/-रूपये और उसने दिए १-१ रूपये के सिक्के .अब जो चंदा हिसाब से बाहर रखना होगा वह कहने को ऐसे भी लिया जा सकेगा तो उसका हिसाब कहाँ रखा जायेगा इसलिए ये नियम भी बेकार .
फिर अरविन्द केजरीवाल कह रहे हैं -''कि ये उनकी नहीं आम लोगों की पार्टी होगी ,जहाँ सारा फैसला जनता करेगी .''तो अरविन्द जी ये भारत है जहाँ लोकतंत्र है और जहाँ हर पार्टी जनता की ही है और हर नेता जनता के बीच में से ही सत्ता व् विपक्ष में पहुँचता है फिर इसमें ऐसी क्या विशेषता है जो ये भ्रष्टाचार के मुकाबले में खड़ी हो .अरविन्द जी के लिए तो एक शायर की ये पंक्तियाँ ही इस जंग के लिए मेरी नज़रों में उनके अभियान को सफल बनाने हेतु आवश्यक हैं-
''करें ये अहद कि औजारें जंग हैं जितने उन्हें मिटाना और खाक में मिलाना है ,
करें ये अहद कि सह्बाबे जंग हैं हमारे जितने उन्हें शराफत और इंसानियत सिखाना है .''
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

प्रस्तुतकर्ता शालिनी कौशिक पर 10:41 am कोई टिप्पणी नहीं:

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

माननीय शालिनी जी !किसी पार्टी को मान्यता देना न देना चुनाव आयोग का दायरा है .और उससे भी ऊपर जनता की अदालत है .जिस पार्टी को कुल मतों का एक न्यूनतम निर्धारित अंश प्राप्त नहीं होता है उसे चुनाव आयोग मान्यता नहीं देता है .लाल बत्ती की गाड़ियां हिन्दुस्तान के आम आदमी का रास्ता रोकके खड़ी हो जातीं हैं .
यहाँ कैंटन छोटा सा उपनगर है देत्रोइत शहर का .दोनों वेन स्टेट काउंटी के तहत आते हैं .ओबामा साहब कब आये कब गए कहीं कोई हंगामा नहीं होता ,हिन्दुस्तान में तमाम रास्ते रोक दिए जाते हैं जैसे कोई सुनामी आने वाली है .लाल बत्ती क्या पद प्रतिष्ठा का आपके लिए भी प्रतीक है ?केजरीवाल साहब अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के लिए लाल बत्ती का प्रावधान नहीं रखना चाहते तो आपको क्या आपत्ति है ?

प्रति रक्षा मंत्री रहते भी जार्ज साहब ने सिक्योरिटी नहीं रखी थी कोठी के बाहर .

Aziz Jaunpuri ने कहा…

Shalini Ji, rajniti aur rajnitigyon ki bhasha sbdavli me pryukt sbdon ke artho ko nkal pana behad mushkil kam hai, sb ke chehre aur hath kamoves ek hitarah hai,sawal kahne aur likhne ka hi nahi hai,uspr aml krne ka bhi hai,jb es mulk me sambidhan ki dhajjiya roj udayee ja rhi hai to......kya ab kuch kahana baki hai

kshama ने कहा…

Sach kahun to ab kisee pe bhee koyee wishwas nahee raha.

रविकर ने कहा…

होय पेट में रेचना, चना काबुली खाय ।

उत्तम रचना देख के, चर्चा मंच चुराय ।

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

माननीय शालिनी जी ! इस भारत देश में सांसद विधायक क्या हर दल्ला कोयला खोर लाल बत्ती लगाए घूम रहा है .एक दो इनके माथे पे भी डिजिटल बत्ती लगनी चाहिए .बहरसूरत आपने मुझे मान सम्मान दिया शुक्रिया करता हूँ जहे नसीब .ये नाचीज़ किस काबिल है .ज़िक्र आपका नहीं है कई और हैं ब्लॉग जगत में जिन्हें चाहिए नारदीय चिरकुट .हाँजी ! हाँ जी! करने को .ये जो कोंग्रेसी हैं इन्हें भी सिर्फ माता जी की जै बोलना ही आता है .

सुशील ने कहा…

राजनीति जब हम
घर में करते हैं
कार्यस्थल में
करते हैं
बाजार में करते हैं
अपनों से करते हैं
परायों से करते हैं
सबकुछ जायज
मानकर करते
चले जाते हैं
बस देश के
लिये राजनीति
की भाषा और
परिभाषा को
केवल क्यों अलग
बनाते हैं ?

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

आपकी एक एक बात सही है। सच्चाई ये है कि भ्रष्टाचार सच में एक बड़ा मुद्दा रहा है। इन लोगों ने मुद्दा तो भ्रष्टाचार को बनाया,लेकिन उसके पीछे गंदी राजनीति चल रही थी, जो अब सबके सामने है।

उस बात का खुलासा भी होना चाहिए कि आखिर अन्ना को इन लोगों मे ऐसी क्या बातें पता चली कि उन्होंने अपना नाम और तस्वीर दोनों इस्तेमाल करने से मना कर दिया.

खैर इंतजार कीजिए अभी और कुछ सामने आएगा।

जब भी समय मिले इस लिंक को भी देखिए..

http://aadhasachonline.blogspot.in/2012/10/blog-post.html#comment-form

रश्मि ने कहा…

उफ ये राजनीति...कौन सच्‍चा, कौन झूठा..पता ही नहीं चलता

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

लाल बत्ती का इस्तेमाल जनता के हितार्थ किया जाये तो इसमें क्या बुराई है कम से कम ये जनता के लिए एक पहचान तो है और इस पहचान को छीन वे कौन से भ्रष्टाचार को रोक पाएंगे ?
सुरक्षा का न लेना ''झीना हिकाका ''वाली स्थिति पैदा कर सकता है क्या ये देश के लिए देश की सुरक्षा के लिए भारी नहीं पड़ेगा ?

शालिनीजी !लाल बत्ती का अवैध इस्तेमाल कैसे कैसे लोग हिन्दुस्तान में करते है इसका वहां के अखबारों में खासा खुलासा एकाधिक बार हो चुका है .

सुरक्षा किससे ...ख़तरा किससे हो सकता है जन -प्रतिनिधि को ?

ख़तरा तब पैदा होता है आपकी सुरक्षा को जब आप लापरवाही से आग लगाते हैं और उस आग से अपनी पीठ भी सेंकना चाहतें हैं .जैसा इंदिराजी ने पंजाब में किया था .

अकाली राजनीति को दफन करने के लिए आपने भिंडरा वाला पैदा किया ,पोषा.आप एक भस्मासुर खड़ा करेंगे तो सबसे पहले वह अपने पैदा करने वाले को ही खायेगा .बेचारे शिव को भी अपनी जाँ बचाने के लिए भागना पड़ा था अपने ही पैदा किए भस्मासुर से आदमी की तो बिसात क्या है .कीमत इंदिराजी को अपनी जाँ से चुकानी पड़ी .

उसी दिशा च्युत राजनीति के विष बीज आज भी हवा में है .अभी यहाँ अमरीका में लैफ,जनरल बरार पर हमाला हुआ .चाक़ू से उनपे वार किया गया .ये वही बरार थे जो ओपरेशन ब्ल्यू स्टार के हीरो थे .

लापरवाही से आग लगाके आप खुद भी नहीं बच सकते .वह आग आपको भी जला डालेगी .ऐसे में सुरक्षा क्या करेगी .कोई सुरक्षा सौ फीसद सुरक्षा नहीं होती .हर सुरक्षा में सूराख होतें हैं .

कृपया यहाँ भी पधारें -

ram ram bhai
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शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2012
चील की गुजरात यात्रा

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

ये आधा सच वाले यहाँ भी आगये .ये तो खुद मान रहें हैं ये आधा ही सच बोलतें हैं .आधा झूठ .यथा स्थिति के पोषक तुष्टिकरण पूजक हैं ये और ऐसे तमाम लोग जो हर परिवर्तन का विरोध करतें हैं .इन तमाम तर्क पंडितों को प्रणाम .बेहतर हो यह भविष्य कथन का धंधा शुरु करें .अच्छा चलेगा मेरे अ-पढ़ भारत में .

ram ram bhai
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शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2012
चील की गुजरात यात्रा

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

ye rajniti:)

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

uff ye rajniti....