रविवार, 21 जुलाई 2013

सबक दहेज़ के दानवों को



Purple turban with gem and pearls isolated on white - stock photo Father_daughter : mother and baby hands at homeIndian Headgear used in Marriages / occasions - stock photo
मंडप भी सजा ,शहनाई बजी ,
आई वहां बारात भी ,
मेहँदी भी रची ,ढोलक भी बजी ,
फिर भी लुट गए अरमान सभी .
समधी बात मेरी सुन लो ,अपने कानों को खोल के ,
होगी जयमाल ,होंगे फेरे ,जब दोगे तिजोरी खोल के .
आंसू भी बहे ,पैर भी पकड़े ,
पर दिल पत्थर था समधी का ,
पगड़ी भी रख दी पैरों में ,
पर दिल न पिघला समधी का .
सुन लो समधी ये भावुकता ,विचलित न मुझे कर पायेगी ,
बेटे पर खर्च जो मैंने किया ,ये मुझको न दे पायेगी .
देख पिता की हालत को ,
बेटी का घूंघट उतर गया .
सम्मान जिन्हें कल देना था ,
उनसे ही माथा ठन गया .
सुन लो बाबूजी बात मेरी ,अब खुद की खैर मना लो तुम ,
पकड़ेगी पुलिस तुम्हें आकर ,खुद को खूब बचा लो तुम .
सुनते ही नाम पुलिस का वे ,
कुछ घबराये ,कुछ सकुचाये ,
फिर माफ़ी मांग के जोड़े हाथ ,
बोले रस्मे पूरी की जाएँ .
पर बेटी दिल की पक्की थी ,बाबूजी से अड़कर बोली ,
अब शादी न ये होगी कभी ,बोलो चाहे मीठी बोली .
ए लड़की !बोलो मुँह संभाल ,
तू लड़की है ,कमज़ोर है ,
हम कर रहे बर्ताव शरीफ ,
समझी तू शायद और है .
बेटी से ऐसी भाषा पर ,बाप का क्रोध भी उबल पड़ा ,
समधी को पकड़ के  खुद ही पुलिस में  देने चल पड़ा .
आ गयी पुलिस , ले गयी पकड़ ,
लालच के ऐसे मारों को ,
देखा जिसने की तारीफें ,
अच्छा मारा इन यारों को .
लड़के वाला होने का घमंड ,जब हद से आगे जायेगा ,
बेटे का बाप बारातों संग ,तब जेले ही भर पायेगा .
बेटी ने लाकर पगड़ी को ,
पिता के शीश पर रख दिया .
पोंछे आंसू माँगा वादा ,
दुर्बल न होगा कभी जिया .
बदलेंगे सोच अगर अपनी ,कानून अगर हम मानेंगे ,
तब बेटी को अपने ऊपर न बोझ कभी हम मानेंगे .
सबक दहेज़ के दानवों को ,गर यूँ बढ़कर सिखलाएंगे ,
सच्चे अर्थों में हम जीवन बेटी को तब दे पाएंगे .
                शालिनी कौशिक 
                              [कौशल ]





9 टिप्‍पणियां:

Sriram Roy ने कहा…

लाख टके की बात ……

shikha kaushik ने कहा…

behtareen abhivyakti .

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सच कहा, यह प्रथा अब जानी होगी।

Dr. Zeashan Zaidi ने कहा…

Achchi Alokparat Kavita!

kshama ने कहा…

Behad sashakt rachana......betion ke liye unki aarthik nirbhartahi unka sahi gahna hai,dahez bhee.

कालीपद प्रसाद ने कहा…


शालिनी जी बहुत खुबसूरत कविता .वास्तव में सोच बदलने की जरुरत है तभी बदलाव आएगा
latest post क्या अर्पण करूँ !
latest post सुख -दुःख

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
अच्छा लिखा है आपने!

sagar ने कहा…

बहुत सुंदर

यहाँ भी पधारे ,

हसरते नादानी में

http://sagarlamhe.blogspot.in/2013/07/blog-post.html

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सदियों पुरानी इस प्रथा का अब अंत हो ही जाना चाहिए ... अभिशाप है ये समाज पे ...

... पता ही नहीं चला.

बारिश की बूंदे  गिरती लगातार  रोक देती हैं  गति जिंदगी की  और बहा ले जाती हैं  अपने साथ  कभी दर्द  तो  कभी खुशी भी  ...