तवज्जह देना ''शालिनी'' की तहकीकात को ,



गफलती में अपनी हम मार खा गए ,
गरकाब अपनी नैया हम खुद करा गए .
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गरजें जो मेघ आकर नाकाम बरसने में ,
गदगद हों बीज बोके अपने घर में आ गए .
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ख्वाजा बने हैं फिरते ख्वाहिश है गद्दियों की ,
संन्यासी समझ हम तो इन्हें सिर बिठा गए.
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रहमान पसोपेश में पहलू बचा रहे हैं ,
हमदर्द मुझ से बढ़कर धरती पे आ गए .
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मुखालफत की खातिर हदें तोड़ें तहजीबों की ,
दानाई में हमारी ये दीमक लगा गए .
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खुद्नुमा खुदगर्जी में डूबे खुमार में ,
खुद्नुमाई करके ये हमको लुभा गए .
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अब तक आज़ाद न हम एक जाल से ,
फिर दायमी इस धुंध में क्यूंकर समां गए .
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काजल की ये कोठरी जिनके यहाँ रहन ,
खिलौना उनके हाथ का खुद को बना गए .
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तवज्जह देना ''शालिनी'' की तहकीकात को ,
रहनुमा ही राह से हमको हटा गए .
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शब्दार्थ :-गफलती-असावधानी , पसोपेश-असमंजस ,गरकाब-जलमग्न ,गदगद-आनद विभोर ,गद्दी-राजा आदि का पद ,ख्वाजा-महात्मा ,रहमान-ईश्वर,खुद्नुमा-आत्मप्रशंसक,खुद्नुमाई-आत्मप्रशंसा की नुमाइश ,दानाई-बुद्धिमानी ,दायमी-चिरस्थायी ,रहन-गिरवी ,तवज्जह-ध्यान ,तहकीकात-खोज ,पहलू बचाना -बगल से निकल जाना .
  
                                              शालिनी कौशिक 
                                                         [कौशल ]


टिप्पणियाँ

yashoda agrawal ने कहा…
आपने लिखा....
हमने पढ़ा....
और लोग भी पढ़ें;
इसलिए शनिवार 06/07/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
पर लिंक की जाएगी.
आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
लिंक में आपका स्वागत है .
धन्यवाद!
रविकर ने कहा…
आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

shikha kaushik ने कहा…
bahut bahut khoob
shyam gupta ने कहा…
सुन्दर ग़ज़ल ...क्या इतने कठिन उर्दू शब्दों की आवश्यकता है....
Shalini Kaushik ने कहा…
@shyam ji ,
ye shabd kathin tabhi tak to hain jab tak ham inhen prayog nahi karte jab ham inhen prayog karenge to fir ye kathin nahi rahenge .bhav ke anusar mujhe ye shabd sahi lage isiliye yahan liye .aapki tippani ke liye aabhar .
Ankur Jain ने कहा…
सुंदर रचना शालिनी जी।।।
Reena Maurya ने कहा…
बहुत ही बेहतरीन गजल...
बहुत खूब ..
:-)
Reena Maurya ने कहा…
बहुत ही बेहतरीन गजल...
बहुत खूब ..
:-)
Madhuresh ने कहा…
बहुत खूब।

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