जिसकी नहीं कदर यहाँ पर ,ऐसी वो बेजान यहाँ है .

Rani of JhansiSarojoni NaiduBegum Hazrat MahalVijaylakshmi PanditKittur Rani ChennammaSucheta KriplaniAruna Asaf Ali
अबला हमको कहने से ,सबकी बढती शान यहाँ है ,
सफल शख्सियत बने अगर हम ,सबका घटता मान यहाँ है .
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बेटी घर की इज्ज़त होती ,इसलिए रह तू घर में ,
बेटा कहाँ फिरे भटकता ,उसका किसको ध्यान यहाँ है .
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बहन तू मेरी बुरी नज़र से ,तुझको रोज़ बचाऊंगा ,
लड़का होकर क्या क्या करना ,मुझको इसका ज्ञान यहाँ है .
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पराया धन है तू बेटी ,तेरी ससुराल तेरा घर ,
दो दो घर की मालिक को ,मिलता न मकान यहाँ है .
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बेटी वाले को बेटे पर ,खर्चे की फेहरिस्त थमा रहे ,
ऊँची मूंछ के रखने वाले ,बिकते सब इन्सान यहाँ हैं .
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बेटा अपना फिरे आवारा ,बहू लगा दो नौकरी पर ,
इतना सब करके भी नारी ,पाती बस फरमान यहाँ है .
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बीवी की खा रहे कमाई ,अपने शीश को खूब उठाकर ,
हमने ही लगवाई नौकरी ,उसकी न पहचान यहाँ है .
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लुटती अस्मत नारी की जब ,दोष उसी का ढूँढा जाये ,
वहशी और दरिंदों का ,न होता अपमान यहाँ है .
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कुछ रुपयों में सौदा होता ,भरी नगर पंचायत में ,
नारी को लज्जित करने पर ,भी मिलता सम्मान यहाँ है .
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खुदगर्जी से भरे मर्द और बिक रहा समाज है ,
नारी जीवन को क्या जग में ,रहने का स्थान यहाँ है .
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मुताबिक ''शालिनी'' के ही ,मुत्तफिक है हरेक नारी ,
जिसकी नहीं कदर यहाँ पर ,ऐसी वो बेजान यहाँ है .
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Savitribhai PhuleUsha MehtaBhikaiji CamaThe Brave Women of India 
                     शालिनी कौशिक
                                    [कौशल ]
शब्दार्थ -मुत्तफिक -सहमत 

टिप्पणियाँ

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज बुधवार (31-07-2013) के कीचड़ तो तैयार, मगर क्या कमल खिलेंगे-- चर्चा मंच 1323 में मयंक का कोना पर भी है!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
Ranjana Verma ने कहा…
जिसकी नहीं कदर यहाँ पर ऐसी वो बेजान यहाँ है.. बिल्कुल सही कहा ..
Ranjana Verma ने कहा…
जिसकी नहीं कदर यहाँ पर ऐसी वो बेजान यहाँ है.. बिल्कुल सही कहा ..
रविकर ने कहा…
बढ़िया प्रस्तुति-
एक बेटी TCS में दूसरी केमिकल इंजीनियरिंग में बी टेक कर रही है-
नाज है हमें अपनी बेटियों पर-

बहुत खुबसूरत और सटीक अभिव्यक्ति !
latest post,नेताजी कहीन है।
latest postअनुभूति : वर्षा ऋतु
संवेदनाओं को झिंझोड़ती पंक्तियाँ..
हर शेर लजवाब ...
गहरा अर्थ लिए ...
Ramakant Singh ने कहा…
खुदगर्जी से भरे मर्द और बिक रहा समाज है ,
नारी जीवन को क्या जग में ,रहने का स्थान यहाँ है .
ऐसा नहीं बस हमारी मुलाकात अच्छे लोगों से समय पर नहीं हो पाती मन भर जाता है गुस्से से
Prakash Govind ने कहा…
पराया धन है तू बेटी ,तेरी ससुराल तेरा घर ,
दो-दो घर की मालिक को, मिलता न मकान यहाँ है.
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बेटी वाले को बेटे पर ,खर्चे की फेहरिस्त थमा रहे ,
ऊँची मूंछ के रखने वाले, बिकते सब इन्सान यहाँ हैं.
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कुछ रुपयों में सौदा होता ,भरी नगर पंचायत में ,
नारी को लज्जित करने पर भी मिलता सम्मान यहाँ है.
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सार्थक सरोकारों से स्पंदित इस रचना के लिए साधुवाद स्वीकार कीजिए
हार्दिक आभार
अरे वाह ..
आप कविता अच्छी करती हैं !!
बधाई !
Ankur Jain ने कहा…
बहुत सही लिखा है..मौजूदा हकीकत को बयां करती प्रस्तुति।।।

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