बुधवार, 8 जून 2011

जीवन की सच्चाई से हम बने रहे अंजान

नैनों में अश्रु बन छाया,होठों पर मुस्कान,
जीवन की सच्चाई से हम बने रहे अंजान

जीवन में सब पाने की जब अपने मन में ठानी,
तभी सामने आ गयी जीवन की बेईमानी .

देने को हमें कुछ न लाया ये जीवन महान,
जीवन की सच्चाई से हम बने रहे अंजान,

हमने जब कुछ भी है चाह हमें नहीं मिल पाया,
जो पाया था इस जीवन में उसे भी हमने गंवाया,

फिर क्यों हालत देख के अपनी होते हैं हैरान,
जीवन की सच्चाई से हम बने रहे अंजान.
                  शालिनी कौशिक 

9 टिप्‍पणियां:

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत सुंदर रचना ....

मनोज कुमार ने कहा…

जीवन में सब पाने की जब अपने मन में ठानी,
तभी सामने आ गयी जीवन की बेईमानी .
यह जीवन की ऐसी सच्चाई है जिससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है।

Ravikar ने कहा…

* तभी सामने आयी अपने जीवन में बेईमानी .

--कब बेईमान हो गए पता ही नहीं चला??

* जीवन की सच्चाई से हम बने रहे अंजान.

फिर भी अपने आपको इमानदार सिद्ध करने में लगे रहते हैं हम ||

शिखा कौशिक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति .बधाई .

Jyoti Mishra ने कहा…

जीवन में सब पाने की जब अपने मन में ठानी,
तभी सामने आ गयी जीवन की बेईमानी .

concordant with facts..... a reality.
Nice read !!

सदा ने कहा…

वाह .. बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सटीक और सार्थक रचना

संगीता पुरी ने कहा…

सुंदर रचना !!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जीवन में सब पाने की जब अपने मन में ठानी,
तभी सामने आ गयी जीवन की बेईमानी ...

Sach hai jab ahankaar/laalach a jaata hai ... beimaani aa jaati hai ...