..... समझ न पायेंगें .

 
ज़ुदा-ज़ुदा से हुए फिर रहे थे आज तलक 
मेहरबाँ हो गए कैसे समझ न पायेंगें ,
भरोसा करके यूँ बैठे हमारी सूरत का 
ज़माने में कभी भी हम समझ न पायेंगें .
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हमारे चेहरे से नफरत तुम्हें थी आज तलक 
करीब क्यूँ हुए इतने समझ न पायेंगें ,
हमारे बोल लबों पर सजाये फिरते हो 
हुए हो हम पे नरम क्यूँ  समझ न पायेंगें .
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 मिली हमें है जो मंज़िल तुम्हारी चाहत थी 
हो तब भी ऐसे में खुश तुम समझ न पायेंगें .
सहारे के सभी ज़रिये तुम्हारे छीने हैं 
बने क्यूँ फिर रहे मेरे समझ न पायेंगें .
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फरेबी कहते थे मुझको दबी ज़ुबान से तुम 
क्यूँ कर रहे वाह-वाह समझ न पाएंगे ,
खफा थे सामने भी तुम खफा थे पीछे भी 
बदले क्यूँ ख़यालात समझ न पायेंगें .
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सियासत ने यूँ बदले हैं तुम्हारे हाव-भाव सारे 
क्यूँ काटें बदले फूलों में समझ न पायेंगें ,
खोले इस कदर परतें तुम्हारी खुल के 'शालिनी '
इसे हम अब यहाँ कैसे समझ न पाएंगे .
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शालिनी कौशिक 
     [कौशल ]

टिप्पणियाँ

Kailash Sharma ने कहा…
बहुत सुन्दर और सटीक प्रस्तुति...
Kanuni gyan ने कहा…
बहुत ही सुन्दर.....

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