शनिवार, 19 अप्रैल 2014

..... समझ न पायेंगें .

 
ज़ुदा-ज़ुदा से हुए फिर रहे थे आज तलक 
मेहरबाँ हो गए कैसे समझ न पायेंगें ,
भरोसा करके यूँ बैठे हमारी सूरत का 
ज़माने में कभी भी हम समझ न पायेंगें .
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हमारे चेहरे से नफरत तुम्हें थी आज तलक 
करीब क्यूँ हुए इतने समझ न पायेंगें ,
हमारे बोल लबों पर सजाये फिरते हो 
हुए हो हम पे नरम क्यूँ  समझ न पायेंगें .
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 मिली हमें है जो मंज़िल तुम्हारी चाहत थी 
हो तब भी ऐसे में खुश तुम समझ न पायेंगें .
सहारे के सभी ज़रिये तुम्हारे छीने हैं 
बने क्यूँ फिर रहे मेरे समझ न पायेंगें .
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फरेबी कहते थे मुझको दबी ज़ुबान से तुम 
क्यूँ कर रहे वाह-वाह समझ न पाएंगे ,
खफा थे सामने भी तुम खफा थे पीछे भी 
बदले क्यूँ ख़यालात समझ न पायेंगें .
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सियासत ने यूँ बदले हैं तुम्हारे हाव-भाव सारे 
क्यूँ काटें बदले फूलों में समझ न पायेंगें ,
खोले इस कदर परतें तुम्हारी खुल के 'शालिनी '
इसे हम अब यहाँ कैसे समझ न पाएंगे .
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शालिनी कौशिक 
     [कौशल ]

4 टिप्‍पणियां:

shikha kaushik ने कहा…

NICE

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर और सटीक प्रस्तुति...

Sriram Roy ने कहा…

बहुत ही सुन्दर .. आभार ..

Ashish Dubey ने कहा…

बहुत ही सुन्दर.....

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