सोमवार, 14 अप्रैल 2014

जलजले इस ज़माने में फटे बिन रह नहीं सकते।


अल्फ़ाज़ दिल की बेबसी को कह नहीं सकते ,
आंसू छिपकर आँखों में रह नहीं सकते।
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गिरे हैं दिल पे आकर जब कभी हालात के पत्थर ,
तसल्ली प्यार के सौ बोल भी दे तब नहीं सकते।
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नहीं लायक तो मानेंगें सभी इलज़ाम हम तेरे ,
कभी काबिल तुम्हारे झूठ को यूँ सह नहीं सकते।
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तरक्की रोककर मेरी फतह पर अपनी न खुश हो ,
किसी दरिया को चट्टानें बांध यूँ रख नहीं सकते।
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रहेगी कब तक दुनिया में दबाकर खुद को ''शालिनी '',
जलजले इस ज़माने में फटे बिन रह नहीं सकते।

शालिनी कौशिक
    [कौशल ]

4 टिप्‍पणियां:

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

'दरिया को चट्टानें बांध यूँ रख नहीं सकते'
- सौ बात की एक बात कह दी है शालिनी जी!

Digvijay Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना बुधवार 16 अप्रेल 2014 को लिंक की जाएगी...............
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

बेहद सशक्त चित्र को शब्दों का पैरहन देती भावपूर्ण रचना।

Digamber Naswa ने कहा…

गिरे हैं दिल पे आकर जब कभी हालात के पत्थर ,
तसल्ली प्यार के सौ बोल भी दे तब नहीं सकते।
बहुत खूब ... लाजवाब शेर है ...

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