सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

savitri aaj bhi aadarsh

१० अक्तूबर २०१० को हिन्दुस्तान समाचार पत्र के रीमिक्स में 'क्षमा शर्मा' का लेख ग्लोबल गाँव की देवियाँ पढ़ा.पूरा लेख प्रेरणादायक लगा किन्तु एक बात मन को चुभ गयी.बात थी "सावित्री का उदाहरण आज बहत नेगेटिव रूप में प्रस्तुत किया जाता है".मीडिया चाहे कितना जोर लगा ले नर-नारी के इस पवित्र सम्बन्ध के महत्व से आम जनता का मन नहीं हटा सकती है.स्त्री पुरूष इस जीवन रुपी गाड़ी के दो पहिये हैं ओर दोनों एक दूसरे के प्रेरणास्रोत व शक्तिपुंज रहे हैं.समस्त नारी समुदाय के लिए सावित्री आदर्श हैं.जिस तरह पत्नी बिना घर भूतों का डेरा कहा जाता है ऐसे ही पति बिना घर अराजकता का साम्राज्य होता है.ऐसे में सावित्री द्वारा पति के प्राण यमराज से लौटा लाना पति के प्रति उनके अगाध प्रेम को दर्शाता है जो प्राकर्तिक है. यदि घर के बाहर कार्यशील होना महिलाओं के प्रगतिशील होने का परिचायक है तो घर के भीतर होना भी कोई पिछड़ेपन की निशानी नहीं है.आज ज़रूरतों के नाम पर भोतिक्वाद की प्रधानता हो गयी है,फलतः परिवार नाम की इकाई के अस्तित्व पर संकट आ गया है.इसलिए सावित्री आज के युग में नेगेटिव उदाहरण न होकर आज की महिलाओं के लिए सबसे सही सकारात्मक उदाहरण हैं.

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