गुरुवार, 13 मार्च 2014

लो फिर आ गया

लो
फिर आ गया
धोती -कुर्ता पहन
बेंत से कर
ठक-ठक आवाज़
आज फिर
उसका
कोई अपना
पुलिस ने पकड़ा
शायद !
रो रहा है
हाथ जोड़ रहा है
आज़ादी
अपने की
चाहे वह हर घडी
परिवार
जो है बहुत बड़ा
पालनकर्ता उस अपने के
पीछे न जाने वो
क्यूँ है पड़ी ?
दालों में कंकड़ भर करके
चर्बी से घी बना करके
खुद का पेट ही नहीं भरा
वो पाले है परिवार मेरा ,
जग थोड़े ही
पालेगा
घर को मेरे
फिर क्यूँ
परवाह
वो किसी की करे ?
ये कहने वाला
आज यहाँ
रो-रोकर पैर है पकड़ रहा
बरसों से घर के सामने से
बिन दुआ सलाम
था गुज़र रहा
पर आज पड़ा
जब से मतलब
दिन-रात यहाँ बैठे टिककर
कानून से पिंड छुड़ाने को
दीवाली मनायी थी
मिलकर
काम हुआ
फिर हमें भूल गया
और आज
हमारा घर
हमारा चेहरा
उसे
फिर याद आ गया
और
नयी मुसीबत
से बचने
लो फिर आ गया
वो धोती-कुर्ता पहन
बेंत से कर
ठक-ठक आवाज़ .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (14-03-2014) को "रंगों की बरसात लिए होली आई है" (चर्चा अंक-1551) में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

रोचक..

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