शनिवार, 29 मार्च 2014

महज़ इज़ज़त है मर्दों की ,महज़ मर्दों में खुद्दारी ,

 
बहाने खुद बनाते हैं,हमें खामोश रखते हैं ,
बहाना बन नहीं पाये ,अकड़कर बात करते हैं .
.......................................................
हुकुम देना है हक़ इनका ,हुकुम सुनना हमारा फ़र्ज़ ,
हुकुम मनवाने की ताकत ,पैर में साथ रखते हैं .
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मेहरबानी होती इनकी .मिले दो रोटी खाने को ,
मगर बदले में औरत के ,लहू से पेट भरते हैं .
...............................................................
महज़ इज़ज़त है मर्दों की ,महज़ मर्दों में खुद्दारी ,
साँस तक औरत की अपने ,हाथ में बंद रखते हैं .
.........................................................
पूछकर पढ़ती-लिखती हैं ,पूछकर आती-जाती हैं ,
इधर ये मर्द बिन पूछे ,इन्हीं पर शासन करते हैं .
........................................................
इशारा भी अगर कर दें ,कदम पीछे हटें उसके ,
खिलाफत खुलकर होने पर ,भी अपनी चाल चलते हैं .
...................................................................
नहीं हम कर सकते हैं कुछ भी ,टूटकर कहती ''शालिनी ''
बनाकर  जज़बाती हमको ,ये हम पर राज़ करते हैं .

..
शालिनी कौशिक 


   [WOMAN ABOUT MAN

5 टिप्‍पणियां:

abhishek shukla ने कहा…

शानदार अभिव्यक्ति......

Basant Khileri ने कहा…

बहुत हि अच्छी प्रस्तुती प्रस्तुत कि आपने!
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Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति...

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

इशारा भी अगर कर दें ,कदम पीछे हटें उसके ,
खिलाफत खुलकर होने पर,भी अपनी चाल चलते हैं बहुत सुन्दर गजल ...!
RECENT POST - माँ, ( 200 वीं पोस्ट, )

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

इशारा भी अगर कर दें ,कदम पीछे हटें उसके ,
खिलाफत खुलकर होने पर,भी अपनी चाल चलते हैं बहुत सुन्दर गजल ...!
RECENT POST - माँ, ( 200 वीं पोस्ट, )

संभल जा रे नारी ....

''हैलो शालिनी '' बोल रही है क्या ,सुन किसी लड़की की आवाज़ मैंने बेधड़क कहा कि हाँ मैं ही बोल रही हूँ ,पर आप ,जैसे ही उसने अपन...