.............सियासत के काफिले .

हमको बुला रहे हैं सियासत के काफिले ,
सबको लुभा रहे हैं सियासत के काफिले .
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तशरीफ़ आवरी है घडी इंतखाब की,
दिल को भुना रहे हैं सियासत के काफिले .
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तसलीम कर रहे हैं हमें आज संभलकर ,
दुम को दबा रहे हैं सियासत के काफिले .
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न देते हैं मदद जो हमें फ़ाकाकशी में ,
घर को लुटा रहे हैं सियासत के काफिले .
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मख़मूर हुए फिरते हैं सत्ता में बैठकर ,
मुंह को धुला रहे हैं सियासत के काफिले .
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करते रहे फरेब हैं जो हमसे शबो-रोज़ ,
उनको छुपा रहे हैं सियासत के काफिले .
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फ़ह्माइश देती ''शालिनी'' अवाम समझ ले ,
तुमको घुमा रहे हैं सियासत के काफिले .
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शालिनी कौशिक
[कौशल ]
शब्दार्थ-तशरीफ़ आवरी-पधारना ,इंतखाब-चुनाव ,फाकाकशी-भूखो मरना ,मखमूर-नशे में चूर

टिप्पणियाँ

Neetu Singhal ने कहा…
बद अमनई-ओ- अख़लाक़ ने आईने शर्मसार किये..,
अब कैसी शक्ल बना रहे सियासत के काफिले.....
Neetu Singhal ने कहा…
बद अमनी-ओ-अख़लाक़ ने आईने शर्मसार किये..,
अब कैसी शक्ल बना रहे सियासत के काफिले.....
shikha kaushik ने कहा…
very nice post .congr8s
सभी मित्रों को होली की हार्दिक वधाई!रचना में अच्छी ढंग से बात कही है !!
सभी मित्रों को होली की हार्दिक वधाई !
अच्छी ढंग से सियासत पर टिप्पणी की है !
सभी मित्रों को होली की हार्दिक वधाई !अच्छी रचना है !
Digamber Naswa ने कहा…
सियासी के काफिले महंगे पड़ जाते है अक्सर ...
सम सामयिक प्रस्तुति बेहद खूबसूरती के साथ
बधाई

एक नज़र ''विरह की आग ऐसी है''
वाह बहुत खूब .....और सही भी है

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