गुरुवार, 27 मार्च 2014

महबूबा यहाँ सबकी बस कुर्सी सियासत की ,


फुरसत में तुम्हारा ही दीदार करते हैं ,
खुद से भी ज्यादा तुमको हम प्यार करते हैं। 

 अपनों से ज़ुदा होने की फ़िक्र है नहीं ,
तुम पर ही जान अपनी निसार करते हैं। 

झुकती हमारी गर्दन तेरे ही दर पे आकर ,
हम तेरे आगे सिज़दा बार -बार करते हैं। 

ये ज़िंदगी है कितनी हमको खबर नहीं है ,
पलकें बिछाके फिर भी इंतज़ार करते हैं। 

बालों में है सफेदी ,न मुंह में दाँत कोई ,
खुद को तेरी कशिश में तैयार करते हैं। 

महबूबा यहाँ सबकी बस कुर्सी सियासत की ,
पाने को धक्का -मुक्की और वार करते हैं। 

''शालिनी ''देखती है देखे अवाम सारी ,
बहरूपिये बन -ठन कर इज़हार करते हैं। 

शालिनी कौशिक 
    [कौशल ]

10 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (28-03-2014) को "जय बोलें किसकी" (चर्चा अंक-1565) "अद्यतन लिंक" पर भी है!
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

yashoda agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना शनिवार 29 मार्च 2014 को लिंक की जाएगी...............
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

yashoda agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना शनिवार 29 मार्च 2014 को लिंक की जाएगी...............
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

Anita ने कहा…

कुर्सी का आकर्षण जो न कराए..

देवदत्त प्रसून ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति !

देवदत्त प्रसून ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति !

देवदत्त प्रसून ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति !

देवदत्त प्रसून ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति !

Kaushal Lal ने कहा…

बहुत सुन्दर......

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुंदर ।

... पता ही नहीं चला.

बारिश की बूंदे  गिरती लगातार  रोक देती हैं  गति जिंदगी की  और बहा ले जाती हैं  अपने साथ  कभी दर्द  तो  कभी खुशी भी  ...